Guru Nanak Dev Ji Sakhiyan गुरु नानक देव जी और गरीब की रोटी

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Guru Nanak Dev Ji Sakhiyan in Hindi

 गुरु नानक देव जी और गरीब की रोटी

गुरु नानक देव जी (Guru Nanak Dev Ji) के समय एक प्रतिष्ठित व धनी व्यक्ति रहता था जिसका नाम मलिक भागो था| एक दिन उसने अपने पिता का श्राद्ध किया| दूर-दूर से संत महात्मा बुलाए गए और भोजन खिलाया गया, ताकि उसे धर्म लाभ मिल सके| उन दिनों गुरु नानक देव जी भी उस स्थान पर आए हुए थे| गुरु नानक देव जी(Guru Nanak Dev Ji) एक बढ़ई (लालो) की विनती करने पर वहां आए थे और उन्हीं के घर का खाना खाते थे|

guru nanak dev ji

Guru Nanak Dev Ji

 

किसी व्यक्ति ने मलिक भागों से शिकायत की कि यहां एक महात्मा आए हुए हैं परंतु वह एक बढ़ई के घर का खाना खाते हैं| जब मलिक भागों को इस बात का पता चला कि लालो के घर एक महात्मा ठहरे हुए हैं तो उसमें अपने आदमी भेज कर गुरु नानक और उनके साथियों को भोजन पर आमंत्रित किया| परंतु गुरु साहिब ने उनके निमंत्रण को ठुकरा दिया|

मलिक भागो ने सोचा कि जब तक सभी महात्मा उसके घर का भोजन नहीं खा लेंगे तब तक उसका भोज अधूरा रहेगा| आखिर में गुरु नानक देव जी मलिक भागों के घर आ गए और लालो भी उनके पीछे-पीछे वहां आ गया|

मलिक भागो ने गुरु साहिब से पूछा:-” आप ब्रह्म भोज में क्यों नहीं आए थे महाराज?”

गुरु साहिब ने कहा:-” ला मालिक! अब खिला दे|”

जब गुरु साहिब ने पीछे पलट कर देखा कि लालो बढ़ई खड़ा है, तो गुरु साहिब ने उससे कहा:-“लालो! तू भी अपनी रोटी ले आ|”

लालो दौड़कर गया और कुछ रोटी तथा बिना नमक का साग ले आया| उधर मलिक भागों के आदमी पूरी कचोरी और अन्य पकवान ले आए|
गुरु साहिब ने अपने दाहिने हाथ में रोटी और उसके ऊपर साग रखा हुआ था तथा बाएं हाथ में पूरी कचोरी पकड़ी हुई थी| उन्होंने सबके सामने उनको निचोड़ा तो लालो की रोटी से दूध निकला और मलिक भागों की पूरी कचोरी से खून|

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Guru Nanak Dev Ji

गुरु साहिब ने कहा:-” देखो मलिक! मैंने तेरा भोज क्यों नहीं खाया था| यह ब्रह्मभोज नहीं बल्कि लोगों का खून है| ब्रह्मभोज तो हमेशा लालो के घर का ही होता है|”

 सीख(Moral):

सही रास्ते से कमाए हुए धन से ही बरकत होती है| नेक कमाई के बिना परमार्थ में कामयाबी नहीं मिलती|

मुर्दा खाने का हुक्म

 

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Guru Nanak Dev Ji

एक बार गुरु नानक देव जी ने अपने शिष्यों से मुर्दा खाने के लिए कहा| यह बात सुनकर सभी शिष्य हक्के-बक्के रह गए| वे सोचने लगे कि हम मुर्दा छू जाने पर भी नहाते हैं तो मुर्दा खाना तो बिल्कुल भी संभव नहीं है|

एक भाई लहणा खड़े रहे, बाकी सब शिष्य वहां से चले गए क्योंकि मुर्दा खाना सभी को नामुमकिन हुक्म लगा था |लेकिन भाई लहणा को नहीं| जब वह मुर्दे के इर्द-गिर्द घूमने लगा तो गुरु साहिब ने उससे पूछा:-” यह तुम क्या कर रहे हो?”

भाई लहणे ने उत्तर दिया:-” हुजूर! मुझे यह समझ नहीं आ रहा कि इस मुर्दे को किस तरफ से खाना शुरू करूं|”

जब वह उस मुर्दे को खाने लगा तो देखा कि वहां कोई मुर्दा ही नहीं था, बल्कि मुर्दे की जगह उसके सामने गुरु का प्रसाद और मीठा हलवा रखा हुआ था|

गुरु नानक देव जी ने उनको गुरु गद्दी का हकदार बना दिया और वह भाई लहणा से गुरु अंगद साहिब बन गए| अंगद का अर्थ है:-‘ गुरु का अपना अंग या हिस्सा|’ इसी तरह से गुरु गोविंद सिंह जी ने भी जब अपने शिष्यों की परख की, तब उन्हें भी 5000 लोगों में सिर्फ पांच प्यारे(पंज प्यारे) मिले थे|

 सीख(Moral):

जब गुरु परखता है तो बड़े-बड़े फेल हो जाते हैं|


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