त्याग, हमें महान बनाता है | Real Sacrifice


त्याग की भावना

Sacrifice makes us great

 

मंत्रों के जाप में जो ‘स्वाहा’ शब्द आता है, उसका अर्थ यही है कि मैं अपने स्वार्थ को त्यागता हूं|

मनुष्य को अपनी बुरी आदतों के साथ-साथ अपनी बुरी संगति का त्याग

भी शीघ्र करना चाहिए|

जैसे नदियां अपना जल स्वयं न पीकर दूसरों के लिए लुटाती(sacrifice) है| पेड़ अपने फल खुद ना खा कर दूसरों को खिलाते हैं|मां, बच्चे के लिए अपना सब कुछ त्याग(sacrifice) करती है एक बीज, वृक्ष बनने के लिए स्वयं का त्याग(sacrifice) मिट्टी से मिलकर करता है वैसे ही मनुष्य के अंदर भी त्याग की भावना होनी चाहिए|

त्याग से मन को शांति मिलती है|

इंसान को यह नहीं भूलना चाहिए कि एक दिन खाली हाथ ही इस दुनिया से जाना है| जिस दिन हमारे अंदर त्याग(sacrifice) की भावना जन्म लेती है, उस दिन हम सीमित से असीमित बन जाते हैं|

जिस दिन हम यह शरीर समाज सेवा या मनुष्य की सेवा में समर्पित करते हैं,

तो हमारा यह तन समस्त विश्व का बन जाता है|

भारतवर्ष का  इतिहास गवाह है कि पिता के वचनों का पालन करने के लिए मर्यादा पुरुषोत्तम रामचंद्र जी ने अपने राजपाट का

त्याग(sacrifice) किया और वन को गए| सैकड़ों सैनिक अपना घर परिवार त्यागकर सीमा के प्रहरी बन कर हमारी सुरक्षा में सदैव तत्पर

रहते हैं| नेताजी सुभाष चंद्र बोस, सरदार भगत सिंह, चंद्रशेखर आजाद जैसे महान पुरुषों ने इस देश की आजादी के लिए अपने जीवन का

त्याग किया| लेकिन वे हमेशा अमर हैं|

त्याग एक तप है जिसके सहारे हम जीवन की ऊंचाइयों को छू सकते है|


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