नाम में क्या रखा है


नाम में क्या रखा है?

 

एक बार एक संत अपनी कुटिया में विश्राम कर रहे थे| तभी उनका एक शिष्य ‘रामचंद्र’ गुस्से से भरा हुआ आया और बोला, गुरुदेव, लोग बड़े निर्लज्ज हो गए हैं| अब देखिए ना, आप की कुटिया के सामने एक व्यक्ति ने बाल काटने की दुकान खोली है और उसकी मूर्खता देखिए| दुकान का नाम रखा है ‘गुरुदेव सैलून’|

उसे फौरन बुलाकर नाम बदलने के लिए कहें| नहीं तो मैं उसकी दुकान में आग लगा दूंगा|

 

संत ने हंसकर कहा, तुम बेकार में ही विरोध कर रहे हो| हनुमान जी ने लंका इसलिए जलाई थी क्योंकि रावण ने सीता माता का हरण किया था| उनके पास उचित कारण था| लेकिन क्या इस सैलून वाले ने ऐसा किया है जो तुम उसकी दुकान जलाने की सोच रहे हो|

वह जो कर रहा है मुझे उसमें कोई बुराई नजर नहीं आती है| वह अपने परिवार का भरण पोषण करने के लिए काम कर रहा है| वह उसकी कर्म स्थली है और कर्म स्थली सदैव मंदिर के समान होती है| क्या तुम मंदिर को जलाओगे| तुम्हें दुकान के नाम पर आपत्ति क्यों है|

तुम्हारे पिता ने तुम्हारा नाम ‘रामचंद्र’ रखा| मगर प्रभु राम को तो तुम्हारे नाम से कोई आपत्ति नहीं है| रामचंद्र को गुरुदेव की बात समझ में आ गई और उसने गुरुदेव से क्षमा मांगी|

गुरुदेव ने कहा:-

कोई भी काम न तो छोटा होता है और ना ही बड़ा होता है| कर्तव्य पालन के लिए किए जा रहे किसी भी काम को हीन दृष्टि से नहीं देखना चाहिए|


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