ऋषि का अहंकार


ऋषि का अहंकार

 

बूढी मां और लाचार बाप को बिलखता छोड़ कर एक ऋषि तपस्या करने के लिए वन में चले गए| तप करने के बाद जब ऋषि उठे तो देखा कि एक कौवा अपनी चोंच में एक चिड़िया का बच्चा दबाकर उड़ रहा है|

ऋषि ने क्रोध से कौवे की ओर देखा| ऋषि की आंखों से अग्नि की ज्वाला टूट पड़ी और कौवा जलकर वही खत्म हो गया|

अपनी इस सिद्धि को देकर ऋषि फूले नहीं समा रहे थे| अहंकार से भरे हुए ऋषि मठ की ओर चल पड़े और रास्ते में ऋषि एक दरवाजे पर जाकर भिक्षा के लिए खड़े हो गए| उनके बार-बार पुकारने पर कोई बाहर नहीं आया तो ऋषि क्रोधित हो गए|

 

उन्होंने फिर पुकारा, पर इस बार आवाज आई, स्वामी जी ठहरिए, मैं अभी साधना कर रही हूं| जब साधना पूरी हो जाएगी तब मैं आपको भिक्षा दूंगी| अब ऋषि की क्रोध की सीमा पार हो गई थी|

ऋषि क्रोध में आकर आकर बोले, दुष्टा! तुम साधना कर रही हो या एक ऋषि का अपमान कर रही हो| जानते नहीं कि इस अवहेलना का परिणाम क्या हो सकता है| भीतर से उतर आया, मैं जानती हूं आप शाप देना चाहेंगे किंतु मैं कोई कौवा नहीं जो आप के प्रकोप से जलकर नष्ट हो जाऊंगी|

जिसने जीवन भर पाला है मैं उस मां को छोड़ कर कर तुम्हें भिक्षा कैसे दे सकती हूं| ऋषि का सिद्धि का अहंकार चूर चूर हो गया| कुछ देर बाद वह महिला बाहर आई तो ऋषि ने आश्चर्य पूर्वक महिला से पूछा| अब कौन सी साधना करती है जिससे तुम मेरे बारे में सब कुछ जानती हो|

उस महिला ने कहा, महात्मन, मैं अपने पति, बच्चे, परिवार और समाज के प्रति कर्तव्यों का निष्ठापूर्वक पालन करती हूं| यही मेरी सिद्धि है|

 


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