हिंदी कविताएं


Best Hindi Poems

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Inspirational Poem in Hindi : प्रेरणादायक कविता 

 

क्या कहा, कठिन है काम, कभी ऐसा मत बोलो तुम |

कर सकते हो हर काम, शक्ति अपनी तो तोलो तुम |

यदि आसान है काम, भला उसका फिर करना क्या ,

जिसको मंजिल तक जाना है, उसको फिर डरना क्या |

श्रम करते ही रहने से हर मुश्किल हल होती है,

डूबे बिन सागर तल में, मिलता किसको मोती है |

कायर ही कठिनाई का रोना ले रुक जाते है,

वीरों के चरणों पर आकर, पर्वत झुक जाते है ||

रामेश्वर दयाल 

Desh Bhakti Poem in Hindi : देशभक्ति कविता 

 

तुमको अपनी मां प्यारी है,

मां को भी तुम प्यारे हो|

उसके दिल के टुकड़े हो तुम,

सूरज चांद सितारे हो|

पर मां से भी बढ़कर है जो,

मातृभूमि है वह प्यारी|

उन दोनों का कर्ज चुकाने,

की तुम पर जिम्मेदारी|

तुम्हें बड़ा करने में दोनों,

की ही बड़ी भूमिका है,

दूजा हक़ तुम पर माँ का,

पर पहला मातृभूमि का है ||

उषा यादव 

Poem on Daughter in Hindi : बेटी बचाओ बेटी पढ़ाओ 


सचमुच धरती का सारा धन,

है ये अपनी बेटियाँ

ब्रह्मा की सुन्दरतम रचना,

 है ये अपनी बेटियाँ |

सभी काम में सबसे आगे,

अपनी प्यारी बेटियाँ

चंदा सी शीतलता देती,

बंद हवा सी पेटिया|

ये वैभव का खुला खज़ाना,

गृह लक्ष्मी है बेटियाँ

ओ पापी ! मत मार भ्रूण में,

ये किलकारी बेटियाँ |

डॉ० जगदीश शरण

Poem on Environment in Hindi : इस प्रदुषण से हमें बचाओ 

पर्यावरण किसे कहते है ?

आओ हम सब इसको जाने |

पर्यावरण प्रदुषण के सब,

खतरों को पहले पहचाने |

जो है चारो तरफ हमारे,

पर्यावरण उसे कहते है |

ध्वनि, जल, मिटटी, वायु सब,

इसके अंतर्गत रहते है ||

Poem on Environment in Hindi #2

मेरे मिट जाने पर, कैसे जल बरसाओगे ?

सूख गए यदि खेत तुम्हारे,

बोलो फिर क्या खाओगे |

भूख प्यास पीड़ित मानवता,

छोड़ अगर तुम जाओगे |

मरकर अपने पूज्य पिता को,

कैसे मुँह दिखलाओगे ||

Poem on Child Labour in Hindi – बाल श्रम पर कविता

 

 

निर्धनता की देन है, ये बालक मजदूर,

दुःख ही दुःख इनको मिले, सुख से कोसो दूर,

फ़ाक़ाकश है जिंदगी, बचपन का अभिशाप,

काम ढूंढ़ते फिर रहे, करते करुण विलाप |

ये गुलाब के फूल है, इनमे गंध अपार,

फिरते कटी पतंग से, अजब पेट की मार |

कोल्हू के बैलो समान, करते है ये काम,

नहीं रात में नींद है, दिन को न आराम |

स्टेशन पर ट्रैन में, फिरते हाथ पसार,

रूखा सूखा जो मिले, करते विवश आहार |

नहीं पेट भर अन्न है, तन के लिए न वस्त्र,

भिखमंगे बनकर रहे, निशदिन होते त्रस्त |

होटल में या मीलों में, मिल जाते कुछ काम,

मलिन मानसिकता लिए, पा जाते कुछ दाम |

धरती इनका बिछोना, छप्पर है आकाश,

खाते सबकी गालियां, फिरते बने उदास |

बुनियादी जो हक़ है, देता इनको कौन,

नियम बना कर के बड़े, हो जाते है मौन |

अवसर यदि इनको मिले, होगा सही विकास,

     पढ़ लिख कर जीवन सुखद, बना सकेंगे आप ||

अवधकिशोर सक्सेना 

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