राजा जनक को ज्ञान प्राप्ति | Ashtavakra Story


एक बार राजा जनक(Raja Janak) ने ज्ञान प्राप्ति के लिए सभी महात्माओं को बुलाया और कहा:- “जो भी मुझे ज्ञान दे सके वह इस सिंहासन पर बैठ कर दें, लेकिन शर्त यह है कि मुझे ज्ञान इतने समय में चाहिए जितना समय घोड़े पर सवार होने में लगता है”| सभी महात्मा सोचने लगे ज्ञान कोई घोलकर पिलाने वाली चीज नहीं है जो तुरंत ही अपना असर कर दें| इतने में अष्टावक्र(Ashtavakra) भी सभा में आ गए उनका शरीर आठ जगह से मुडा हुआ था और वह कुबड़े थे|

 

उन्होंने सोचा कि अगर राजा को ज्ञान का अनुभव ना हुआ तो महात्मा के भेष को लाज आएगी| यह सोचकर वह चुपचाप सिंहासन पर जाकर बैठ गए|

सभा में उपस्थित सभी ऋषि-महात्माओं ने समझा कि कोई पागल सिंहासन पर आकर बैठ गया है| सभी लोग उनके शरीर को देखकर उनकी मजाक बनाने लगे|

अष्टावक्र(Ashtavakra) जी ने कहा:-” मैंने सोचा था कि यह महात्माओं की सभा है| पर लगता है कि आप में से कोई भी महात्मा नहीं है| आप सभी लोग तो मोचियों की तरह इस शरीर को देख रहे हो|” अष्टावक्र(Ashtavakra) जी की यह बात सुनकर सभी महात्मा शांत हो गए|

अष्टावक्र जी ने राजा जनक से पूछा:- ‘तू ज्ञान लेना चाहता है?’

राजा ने जवाब दिया:-” जी हां|”

अष्टावक्र ने कहा कि ज्ञान की कुछ दक्षिणा भी होती है, क्या तुम दक्षिणा दे सकते हैं?

राजा ने कहा:-” मेरे पास जो कुछ भी है मैं आपको देने को तैयार हूं|”

अष्टावक्र ने कहा:-” मैं भी तुमसे वही मांगूगा जो तुम्हारी सामर्थ्य में है| तो ठीक है राजन! मैं तुमसे तीन चीजें मांगता हूं- तन, मन और धन

राजा ने थोड़ी देर सोच कर कहा:-” मैंने अपना तन, मन और धन आपको दिया|”

अष्टावक्र ने कहा:-” फिर सोच लो राजा! कहीं ऐसा ना हो कि तुम्हें पछताना पड़े|”

राजा जनक ने कहा:-” नहीं महाराज मैंने सोच लिया और मैं संकल्प करता हूं कि मैं अपने वचन से पीछे नहीं हटूंगा|”

अष्टावक्र ने राजा से कहा:-” देखो राजा! तुम मुझे अपना तन, मन और धन दे चुके हो| इन सबका मालिक अब मैं हूं तू नहीं| मैं हुक्म देता हूं कि तुम सबके जूतों में जाकर बैठ जाओ|”

यह सुनकर दरबार में एकदम सन्नाटा छा गया| सब चुप हो गए और सोचने लगे कि अपनी प्रजा और अपना राज्य, इन सबके सामने राजा कैसे जूतों में जा कर बैठेगा?

मगर राजा समझदार था, उनको जरा भी देर नहीं हुई और वह चुपचाप जूतों में जाकर बैठ गए| अष्टावक्र ने ऐसा इसलिए किया था कि राजा कि लोक लाज खत्म हो जाए| लोक-लाज बड़ी भारी रुकावट है|

अष्टावक्र ने कहा:-” यह धन भी मेरा है| मेरे धन में अपना मन मत लगाना”

लेकिन राजा का मन बार-बार इधर-उधर जा रहा था क्योंकि मन की आदत है कि यह कभी खाली नहीं बैठता| यह बराबर कुछ ना कुछ सोचता रहता है| जैसे ही राजा का मन इधर-उधर भटकता था, राजा तुरंत ही उसको वापस ले आते थे|

अंत में राजा आंखे बंद करके बैठ गया कि मैं ना तो बाहर देखूंगा और ना ही मेरे मन में कोई ख्याल आएगा| अब राजा का मन एकाग्र हो गया| अपना मतलब पूरा हुआ देखकर अष्टावक्र ने पूछा:- राजा अब तू कहां है?

राजा जनक बोले:-” मैं अंदर हूं|”

अष्टावक्र ने कहा:-” खबरदार राजा! तुम अपना मन भी मुझे दे चुके हो| इस मन पर अब तुम्हारा कोई अधिकार नहीं है”

यह सुनते ही राजा का मन तुरंत ही रुक गया| जब राजा का मन सबसे हटकर एकचित हो गया| अष्टावक्र ने अपना ज्ञान दे दिया| राजा की रूह अंदर चली गई और रूहानी मंजिलों की सैर करती हुई ज्ञान की लज्जत लेने लगी|

अष्टावक्र ने राजा को कई बार बुलाया परंतु राजा नहीं बोले| थोड़ी देर बाद जब राजा ने आंखें खोली तो अष्टावक्र ने पूछा:-” क्या ज्ञान हो गया?”

राजा ने उत्तर दिया:-” जी हां! मुझे ज्ञान हो गया और यह इतना श्रेष्ठ और उत्तम था कि मैंने इस बारे में कभी सपने में भी नहीं सोचा था|”

अष्टावक्र(Ashtavakra) ने फिर पूछा:-” अभी भी कोई शक तो नहीं रह गया है!”

राजा जनक ने कहा:-” नहीं महाराज! अब कोई शक नहीं रह गया है|”

अष्टावक्र(Ashtavakra) ने कहा:-” मैं यह तन, मन और धन तुम्हें प्रसाद के तौर पर वापस देता हूं| लेकिन इन्हें अपना मत समझना| राज भी करो और भजन भी करो| संसार की धन दौलत को मन से निकाल दो, अब तुम्हें प्रभु के नाम का अनमोल खजाना मिल गया| अब तुम इस संसार की वस्तुओं से मोह नहीं करोगे बल्कि प्रभु से उसके प्रेम और अनुभव की याचना करोगे|”

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