मन का साधना


मन का साधना

 

रतनगढ़ नाम के एक कस्बे की बात है| सुबह होते ही एक भिखारी, एक ठाकुर के घर भीख मांगने पहुंच गया| भिखारी ने ठाकुर साहब की हवेली का दरवाजा खटखटाया|

उन दिनों ठाकुर साहब के दिन अच्छे नहीं चल रहे थे| दरवाजे पर आए व्यक्ति को हाजिरी देने लायक भी कोई व्यक्ति नहीं था|

 

ठाकुर साहब खुद बाहर आए और उन्होंने देखा कि आया हुआ व्यक्ति एक भिखारी है तो सहज ही उनका हाथ जेब में चला गया| लेकिन जेब में देने के लिए कुछ भी नहीं था| इस बात से दुखी होकर ठाकुर घर के अंदर गए और एक बर्तन उठा कर भिखारी को दे दिया|

जल्दी में यह नहीं देख पाए कि वह बर्तन दान में दिया जाना भी चाहिए था या नहीं| भिखारी के जाने के थोड़ी देर बाद ही ठाकुर साहब की पत्नी आई| उन्हें घर में बर्तन नहीं मिला तो ठाकुर साहब से पूछा| ठाकुर साहब ने बताया कि वह बर्तन तो उन्होंने एक मांगने वाले को दे दिया है|

यह सुनकर ठाकुर साहब की पत्नी चिल्लाने लगी, अरे! यह क्या कर दिया आपने, चांदी का बर्तन भिखारी को दे दिया|

जल्दी जाओ और उसे वापस लेकर आओ| ठाकुर साहब दौड़ते हुए गए और भिखारी को रोककर कहा, भाई मेरी पत्नी ने मुझे बताया है कि यह बर्तन चांदी का है, कृपया करके इसे सस्ते में मत बेचना|

वहीं पर ठाकुर साहब के एक मित्र खड़े हुए थे| उन्होंने उनसे पूछा, मित्र, जब आपको पता चल ही गया था कि यह बर्तन चांदी का है तो वह बर्तन आपको वापस ले लेना चाहिए था|

ठाकुर साहब ने मुस्कुराते हुए कहा, मैंने बर्तन वापस इसलिए नहीं लिया क्योंकि मैं मन को इस बात का एहसास कराना चाहता था कि बड़ी से बड़ी भूल और हानि होने पर भी कभी दुखी और निराश नहीं होना चाहिए|

 


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