बगीचे की हवा


बगीचे की हवा

 

राजा कृष्णदेव राय का दरबार लगा हुआ था| गर्मी का मौसम था| गर्मी के कारण सभी का बुरा हाल था और सभी दरबारी पसीने से तरबतर हो रहे थे| उनमें से कुछ दरबारी बोले:- “महाराज, सुबह सवेरे बगीचे की हवा बहुत ही शीतल और सुगंधित होती है| क्या ऐसी हवा दरबार में नहीं लाई जा सकती”?

शेष दरबारी यह प्रश्न सुनकर चुप हो गए| तब महाराज ने घोषणा की कि जो कोई भी बगीचे की हवा दरबार में लाएगा उसे 1000 स्वर्ण मुद्राएं पुरस्कार में मिलेगी|

सारे दरबारी महाराज की इस घोषणा को सुनकर अचंभे में पड़ गए| उनकी समझ में यह नहीं आ रहा था कि बगीचे की हवा को दरबार में कैसे लाया जा सकता है?

सभी दरबारियों के उतरे हुए चेहरे देखकर महाराज ने ठंडी सांस ली और बोले:-” लगता है कि हमारे बगीचे की हवा को कोई भी नहीं ला सकता है”|

महाराज की ऐसी निराशा भरी बात सुनकर तेलानीराम से रहा नहीं गया और वह बोला:- “मैं उस हवा को कैद कर के लाया हूं| आज्ञा हो तो उसे यहां छोड़ दूं”?

महाराज ने प्रसन्न होकर कहा:-” नेकी और पूछ पूछ| कहां है हवा? उसे तुरंत ही दरबार में छोड़ दो”|

तेनालीराम ने तुरंत ही बाहर खड़े हुए 10 व्यक्तियों को बुलाया उन सभी के हाथों में खसखस, गुलाब और चमेली के फूलों से बने हुए बड़े-बड़े पंखे थे, जो इत्र से पूरी तरह भीगे हुए थे|

तेनालीराम ने उन 10 नौकरों को महाराज के पीछे अगल बगल में खड़े होकर पंखे झेलने की आज्ञा दी|
थोड़ी ही देर में महकती हुई ठंडी हवा से सारा दरबार भर गया| सभी दरबारी तेनालीराम की जय जयकार करने लगे|

महाराज कृष्णदेवराय, तेनालीराम की तीव्र बुद्धि की सराहना करते हुए बोले:- “तेनालीराम, तुम इंसान के रुप में फरिश्ता हो| हर नामुमकिन चीज को भी हाजिर करने की क्षमता तुम्हारे अंदर है”| महाराज ने तेनालीराम को 1000 स्वर्ण मुद्राएं पुरस्कार स्वरूप भेंट की|


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