मिट्टी के तरबूज Mitti Ke Tarbooz


मिट्टी के तरबूज – Mitti Ke Tarbooz

 

गर्मी का मौसम समाप्त हो चुका था| महाराज कृष्णदेव राय का दरबार लगा हुआ था| अचानक उन्होंने देखा कि उनका बचपन का सबसे प्रिय मित्र आ रहा है| राजा ने अपने मित्र को गले लगा कर खुशी जाहिर की और उन्हें अपने निजी कक्ष में ठहराया| मित्र की दृष्टि दीवार पर बने एक चित्र पर गई| चित्र में दो तरबूज बने हुए थे| वह सोचने लगा कि इतने सुंदर तरबूज (Tarbooz) तो मैंने कई वर्षों से नहीं देखे हैं, यदि ऐसे तरबूज खाने को मिल जाए तो मजा आ जाए|

Tarbooz

 

अगले दिन मित्र ने चित्र वाले तरबूज की बात दरबार में दोहराई और बोला:-” ऐसे तरबूज देखे हुए वर्षों बीत गए हैं”|मित्र की यह बात सुनकर राजा कृष्णदेव राय ने अपने दरबारियों से कहा:-” क्या कोई ऐसा दरबारी है जो हमारे मित्र की इच्छा पूरी कर सकता है”? यह मौसम तरबूजों का ना होने के कारण बहुत खोजबीन के बाद भी कहीं पर तरबूज (Tarbooz) नहीं मिला|

इसी बीच एक दरबारी ने व्यंग्य करते हुए कहा:-” महाराज! असंभव को संभव करने वाले तेनालीराम ही आपके मित्र की इच्छा पूर्ण कर सकते हैं”|राजा कृष्णदेवराय, तेनालीराम की तरफ देखने लगे| तेनालीराम बोला:- “महाराज! आप मुझे एक दिन की मोहलत दे दे तो आपके मित्र की इच्छा पूर्ण हो सकती है”| एक दिन बाद तरबूज लाने का वादा करके तेलानी राम दरबार से चले गए|

तेनालीराम ने एक कुम्हार से मिट्टी के ऐसे तरबूज तैयार कराएं कि उन्हें देखकर कोई यह नहीं कह सकता था कि यह असली है या नकली|
तेनालीराम की प्रतीक्षा में राजा कृष्णदेव राय अपने महल में अपने मित्र के साथ बेचैनी से टहल रहे थे| तभी तेनालीराम अपने सेवकों को लेकर महाराज के सामने उपस्थित हो गए|

सेवकों के हाथों में तरबूजा से भरी हुई टोकरियां थी| तरबूज (Tarbooz), एक से बढ़कर एक सुंदर दिखाई दे रहे थे| इन तरबूज को देखकर राजा एवं उसके मित्र ने तेनालीराम की तारीफों के पुल बांध दिए| राजा का मित्र बोला:-” इतने सुंदर तरबूज तो आज बरसों के बाद देखने को मिले है”| राजा ने तरबूज (Tarbooz) को खाने के लिए अपने

नौकरों को चाकू और थाली लाने की आज्ञा दी| तभी तेनालीराम बोल पड़े:- ” महाराज! यह तरबूज केवल देखे ही जा सकते हैं, खाए नहीं जा सकते| आपके मित्र ने केवल यही इच्छा प्रकट की थी कि मैंने कई वर्षों से ऐसे सुंदर तरबूज नहीं देखे हैं| इसलिए इन्हें तरबूजों के दीदार करने दीजिए|

महाराज ने बड़े गौर से तरबूजों को देखा तो उन्हें पता चला कि यह तरबूज मिट्टी के हैं|

तेनालीराम की चतुराई पर महाराज व उनका मित्र बहुत प्रसन्न हुए| उनका मित्र यह जानकर कि यह तरबूजों का मौसम नहीं है, बहुत ही शर्मिंदा होकर बोले: “तेलानी राम जी! हमने इतने सुंदर तरबूज (Tarbooz) देख भी लिए और खा भी लिए| हम आपके इस चतुराई पूर्ण कार्य से बहुत संतुष्ट हैं|

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