आत्म संतोषी ब्राह्मण


आत्म संतोषी ब्राह्मण

एक बार तेनालीराम से राजा कृष्णदेव राय बोले:-” तुम्हारे पास काफी धन हो गया है| धनी मनुष्य को दान करते रहना चाहिए इससे धन और बढ़ता है| जो व्यक्ति दूसरों के लिए कुछ नहीं करता वह भी कोई मनुष्य कहलाने योग्य है? तुम किसी ब्राह्मण को एक मकान ही दान में दे दो|

‘जैसी महाराज की इच्छा’ तेनालीराम ने कहा|

तेनालीराम ने एक छोटा सुंदर सा मकान बनवाया जिसके चारों ओर फूलों का एक बगीचा था| मकान के मुख्य द्वार पर एक तख्ती टांग दी, जिस पर लिखा था:-” यह मकान उस ब्राह्मण को दान में मिलेगा जो आत्म संतोषी होगा|”

बहुत दिनों तक उस मकान को पाने के लिए कोई ब्राह्मण नहीं आया| अंत में एक ब्राह्मण ने आकर तेनालीराम से कहा:-” मैं आत्म संतुष्ट ब्राह्मण हूं, इसलिए यह मकान मुझे दान में मिलना चाहिए|”

तेनालीराम ने कहा:-” तुम केवल लालची ही नहीं झूठे और मूर्ख भी हो| तुम्हें तख्ती पर लिखे सीधे-साधे शब्दों का अर्थ भी नहीं पता? अगर तुम आत्म संतोषी हो तो फिर तुम यह मकान क्यों मांगने चले आए? तुम्हें मकान को दान करके मैं अपने वचनों से फिरना नहीं चाहता| मुझे हमेशा यह दुख रहेगा कि मैंने इस मकान को एक मूर्ख को दान कर दिया| अब तुम यहां से जा सकते हो|”


Related posts

Leave a Comment