Moral Stories in Hindi

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 Moral Stories in Hindi

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बचपन में दादा-दादी, नाना-नानी से जिन कहानियों को सुनकर हम बड़े हुए हैं| कुछ ऐसी ही चुनिंदा Hindi Moral Stories का संग्रह नीचे दिया गया है, जिनको पढ़कर आपको जीवन में कुछ ना कुछ सीख अवश्य मिलेगी| प्रत्येक कहानी में कुछ ना कुछ संदेश व शिक्षा छुपी हुई होती है|इसलिए प्रत्येक कहानी के अंत में कहानी से मिलने वाली सीख (moral) को अच्छे से highlight किया गया है|प्रस्तुत है हिंदी  में 50 सबसे बेहतरीन प्रेरणादायक कहानियां (Moral Stories in Hindi):-

Moral Stories in Hindi

50 + New Hindi Moral Stories

 

एक चिड़िया का राजा को ज्ञान

चौथी बात-A Bird story in Hindi

एक राजा के महल में एक सुंदर बगीचा था| बगीचे में अंगूर की बेल लगी हुई थी और उस बैल पर एक चिड़िया रोज आकर बैठती थी|

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चिड़िया प्रतिदिन अंगूर की बेल से चुन-चुनकर मीठे अंगूर खाती थी और खट्टे अंगूर को नीचे गिरा देती थी| बगीचे के माली ने चिड़िया को पकड़ने की बहुत कोशिश की पर वह माली के हाथ नहीं आती थी|

माली ने राजा को यह बात सुनाई| यह सुनकर राजा ने चिड़िया को सबक सिखाने की ठान ली और अगले दिन बगीचे में घूमते हुए जब चिड़िया अंगूर खाने आई तो राजा ने उसे पकड़ लिया| वह चिड़िया को मारने लगा तो चिड़िया ने कहा, राजन, मुझे मत मारो मैं आपको ज्ञान की चार बातें बताऊंगी|

राजा ने कहा जल्दी बता| चिड़िया बोली,
पहली बात:- हाथ आए शत्रु को कभी नहीं छोड़ना चाहिए|
दूसरी बात:- असंभव बातों पर भूलकर भी विश्वास नहीं करना चाहिए|
तीसरी बात:- बीती हुई बातों पर कभी पश्चाताप नहीं करना चाहिए|

फिर चिड़िया अचानक रुक गई राजा ने कहा चौथी बात भी बता दो| चिड़िया बोली, चौथी बात जरा ध्यान से सुनने की है| मुझे जरा ढीला छोड़ दें क्योंकि आपके हाथों में मेरा दम घुट रहा है|

राजा ने हाथ ढीला छोड़ दिया तो चिड़िया एकदम से उड़कर पेड़ की डाल पर बैठ गई और बोली,

चौथी बात यह थी कि मेरे पेट में दो हीरे हैं|

यह सुनकर राजा को बड़ा दुख हुआ| राजा की हालत को देखकर चिड़िया बोली, है राजन, आपने मेरी बात नहीं मानी| मैं आपकी शत्रु थी फिर भी आपने मुझे छोड़ दिया| दूसरी बात में मैंने बताया था कि असंभव बातों पर भूलकर भी विश्वास नहीं करना चाहिए| मैंने आपसे कहा कि मेरे पेट में दो हीरे हैं और आपने भरोसा कर लिया|

सीख:-
ज्ञान की बातें सुनने और पढ़ने से कोई लाभ नहीं होता यदि आप जीवन में उन पर अमल नहीं करते हैं|

 

घमंडी घोड़ा और बकरा

एक बकरे की कहानी जो परोपकार के चक्कर में हलाल हो गया

एक राजा को जानवर बहुत प्रिय थे राजा ने अपने राज्य में हर प्रकार के जानवरों को इकट्ठा कर रखा था| उन जानवरों में एक बहुत ही खूबसूरत घोड़ा भी था| वह घोड़ा राजा का सबसे प्रिय जानवर था राजा जहां भी जाते थे उस  घोड़े की ही सवारी करते थे दिनभर राजा को अपनी पीठ पर लादे लादे उस बेचारे घोड़े की कमर टूट जाती थी|

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हालांकि घोड़े की खातिरदारी भी जमकर होती थी अलग-अलग तरह के बढ़िया और जायकेदार पकवान उस घोड़े के लिए बनवाए जाते थे सभी जानवरों में उस घोड़े को सर्वश्रेष्ठ माना जाता था बड़े-बड़े हाथी भी घोड़े को झुक कर सलाम करते थे|

अब घोड़े को धीरे-धीरे घमंड होने लगा कि सब उसकी तारीफ करते हैं, क्योंकि वह सभी जानवरों में सबसे सुंदर है और मेरी सुंदरता के कारण राजा को सम्मान मिलता है| जिस दिन मैं नहीं रहूंगा तो राजा का सारा मान-सम्मान खत्म हो जाएगा|

लिहाजा घोड़े ने तय किया कि अब वह सिर्फ अपनी मनमर्जी चलाएगा| अगले दिन घोड़ा बीमार होकर बैठ गया सभी जानवरों ने उसे समझाया कि राजा के जाने का समय हो रहा है, लेकिन वह टस से मस नहीं हुआ|

राजा ने शाही वैद्य को बुलवाया वैद्य ने घोड़े को देखा और बोला, यह घोड़ा अब दौड़ने लायक नहीं रहा महाराज| अगर यह अगले 3 दिनों में उठकर खड़ा नहीं हुआ तो इसे मार देना ही अच्छा होगा|लेकिन घोड़ा अच्छी तरह समझता था कि राजा की जान उसी में बसी है इसलिए राजा उसे नहीं मारेंगे इस तरह 2 दिन बीत गए|

तीसरे दिन घोड़े के पास वाले तबेले में एक नया बकरा आया घोड़े को लगा कि यह बकरा तो मुझसे भी सुंदर है| कहीं यह बकरा मेरी जगह ना ले ले|

घोड़े ने अपनी कहानी उस बकरे को बताई घोड़े ने बकरे को बताया कि किस तरह उसने राजा की नजरों में अपनी इज्जत एकदम गिरा दी है|

बकरे ने घोड़े को सांत्वना दी और कहा मैं तुम्हारे लिए राजा से बात करूंगा| तभी राजा ने बकरे को बुलावा भेजा जब बकरा राजा के पास पहुंचा तो उसने राजा से घोड़े की खूब तारीफ की और बताया कि घोड़ा राजा को बेहद चाहता है| राजा यह सुनकर खुश हो गया और उन्होंने राज्य में शाही भोज का ऐलान कर दिया|

अगले दिन घोड़ा तो खुशी-खुशी वापस राजा की सवारी बन गया लेकिन बेचारा बकरा शाही भोज में पक गया|

सीख:-
अपने काम से काम न रखने पर कभी-कभी नुकसान भी उठाना पड़ जाता है

 

एक धार्मिक और प्रेरणादायक कहानी

साधु और फांसी का फंदा

Top Moral Story in Hindi

एक बार की बात है कि एक साधु को गुरु नानक देव जी के साथ रहने का सौभाग्य प्राप्त हुआ| वह साधु,भेष को बहुत महत्व देते थे| उनको वास्तव में गुरु और नाम पर कोई विश्वास नहीं था| एक दिन उसने कहा कि मुझे कोई ऐसा महात्मा बताओ, जिसकी मैं संगति कर सकूं|

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गुरु नानक साहिब ने कहा कि बड़े-बड़े महात्मा है; फिर भी अगर तुझे जाना है तो रास्ते में एक बढ़ई का घर है उसके पास चला जा|जब वह साधु वहां पहुंचा तो बढ़ई उठ खड़ा हुआ और एक चारपाई डाल दी|

बहुत देर तक बढ़ई ने साधु से कोई बात नहीं की बल्कि अपना काम करता रहा| जब साधु थोड़ी देर बैठ कर काफी निराश होकर जाने लगा तो बढ़ई ने कहा:- “2 घंटे सब्र करो महाराज! मुझे एक बहुत जरूरी काम है, पहले वह निपटा लूँ फिर आपकी सेवा में बैठूंगा|”

साधु ने मन में सोचा कि यह तो निपट संसारी है| इससे दुनिया के काम ही नहीं छूटते| यह कैसा महात्मा है? तभी एक आदमी दौड़ता हुआ उस बढ़ई के घर आकर बोला:-” आपका लड़का छत से गिरकर मर गया है|”

इस बात को सुनकर बढ़ाई जरा भी नहीं घबराया और शांतिपूर्वक बोला:-” सब मालिक की मर्जी|”दाह संस्कार के बाद और आए हुए लोगों से विदा मांगते हुए वह बढ़ई, साधु के पास आया|

साधु उस बढ़ई से कहने लगे:-” जब आपको इन सब बातों का पता था तब आपने अपने लड़के को गिरने से क्यों नहीं बचाया?”

बढ़ई ने कहा:-” बच्चे को इसी तरह से मरना था और बच्चे से मेरा रिश्ता इसी तरह से टूटना था| यह सब भले के लिए ही हुआ है और मैं मालिक की रजा में राजी हूं|”

इस पर साधु ने कहा:-” जरूर तेरे बेटे के साथ तेरी दुश्मनी थी| तू बेटे को अपने पास रखना ही नहीं चाहता था|” यह सब कह कर साधु वहां से नाराज होकर जाने लगा तो बढ़ई ने साधु से कहा:-” तुम मुझे क्या कहते हो, आज आठवें दिन तू फांसी पर लटक कर मारेगा| अगर बच सकता है तो बच जा| मैं तो यही समझता हूं कि जो कुछ होना होता है, होकर ही रहता है|”

अब साधु को चिंता हो गई कि कहीं मेरे साथ भी ऐसा ही ना हो जाए| साधु ने सोचा कि इस पेड़ से बहुत दूर चला जाऊंगा तो इससे फांसी लगने का सवाल ही नहीं रहेगा|

यह सोचकर वह 4 दिन तक भूखा-प्यासा जितना दौड़ सकता था दौड़ता रहा| भूख-प्यास से व्याकुल होकर वह गिर पड़ा और सो गया| जब उठा तो दिशा का ख्याल ही नहीं रहा और वापस उसी ओर दौड़ने लगा जिस ओर से आया था|

फिर 4 दिन तक लगातार भागता रहा और आखिर उसी जगह पर पहुंच गया जहां से 8 दिन पहले भागना शुरु किया था| जब 8 दिन हो गए तो सोचने लगा कि अब मुझे कौन फांसी पर लटका सकता है| मैं तो उस पेड़ से कोसों दूर चला आया हूं| वह बढ़ई झूठा है, आज मेरा आठवां दिन है| यह सोचकर साधु,उसी पेड़ के नीचे सो गया|

वहां से कुछ दूर एक शहर में कुछ चोर, चोरी का माल लूटकर उसी रास्ते से निकल रहे थे| जितना सोना चांदी और सामान था, उन्होंने आपस में बांट लिया| पर एक सोने का हार बाकी रह गया|

उनके ध्यान में आया कि यह बहुत खूबसूरत है क्यों ना इसे साधु के गले में डाल दिया जाए| यह सोचकर वह हार उन्होंने सोए हुए साधु के गले में डाल दिया और वहां से भाग गए|

जब दिन निकला तो सिपाहियों ने उस साधु को पकड़ लिया और राजा के पास ले गए| राजा ने साधु के बयान लिए बिना ही उसे फांसी की सजा सुना दी और कहा:- “इसे उसी पेड़ से लटका कर फांसी दे दी जाए जहां पर यह सो रहा था|”

उस साधु से पूछा गया:- “यदि तुम्हें किसी से मिलना हो तो बताओ”|

साधु ने कहा:-“इस गांव में एक बढ़ई रहता है, मुझे उससे मिलना है”|

उस बढ़ई को बुलाया गया जब वह आया तो साधू बोला:-” आप ठीक कहते थे| होनी को कोई नहीं टाल सकता”| अब सामने वही पेड़ हैं, वही मैं हूं और फांसी का हुक्म हो चुका है| कृपा करके मुझे बचा लीजिए| मैं सारी उम्र आपका एहसान नहीं भूलूंगा|

बढ़ई ने कहा मैं अपने सतगुरु नानक साहिब का सिमरन करता हूं और मुझे आशा है कि वह मेरी विनती जरूर सुनेंगे| थोड़ी देर में ही खबर आई कि असली चोर पकड़े गए हैं|

उन चोरों ने चोरी का सारा माल वापस कर दिया और राजा ने उस साधु को छोड़ दिया| साधु, बढ़ई के घर पर पहुंचा और उनसे शिक्षा दीक्षा लेकर उनका सच्चा सेवक बन गया|

सीख:-
होनी को कोई नहीं टाल सकता|

 

मोहित का आत्मविश्वास – A Motivational Moral Story

एक ऐसे लड़के की कहानी जिसने अपने दोनों पैर गवाने के बावजूद, नए सिरे से जिंदगी की शुरुआत की

आज मैं जिस लड़के की कहानी आप को सुनाने जा रहा हूं उसका नाम मोहित है| मोहित को बचपन से ही घूमने फिरने का बहुत शौक रहा है| नई जगह को देखना और नए लोगों से मिलना उसकी आदत में शुमार था|

स्नो ग्लाइडिंग(Snow gliding) उसका सबसे पसंदीदा शौक बन गया था| जिंदगी पूरी तरह से उसके हाथों में थी और वह जिंदगी को पूरी तरह से जी रहा था|

 

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लेकिन फिर एक झटके ने अचानक उसकी पूरी जिंदगी ही बदल कर रख दी| मोहित को मैनिंजाइटिस हो गया जिसकी वजह से उसका बाया कान, किडनी और घुटनों के नीचे दोनों पैरों ने काम करना बंद कर दिया था|

उसके परिवार वालों का रो रो कर बुरा हाल था| वे उस दिन को कोस रहे थे जब मोहित ने लद्दाख जाने का फैसला किया था| काफी दिनों तक कोमा में रहने के बाद जब मोहित को होश आया तो उसके दोनों पैर गायब थे|

जो आदमी अपने पैरों से दुनिया नापने की ख्वाहिश रखता हो उसके पैर ही नहीं रहे तो ऐसी जिंदगी का फिर कोई मतलब नहीं रह जाता है|

मोहित की जिंदगी कुछ ही दिनों में बदल गई| मोहित अब डिप्रेशन में चला गया और हर वक्त अपने अधूरे सपनों के बारे में सोचता रहता था| एक दिन अचानक उसने तय किया कि ऐसे कब तक चलेगा|

उसने वापस से जीवन को नए सिरे से जीने का फैसला किया| डॉक्टरों की मदद से उसने प्रोस्थेटिक पैर लगवाएं और फिर से अपने पैरों पर खड़ा होना सीख लिया|

जब भी कोई उससे पूछता तो वह केवल एक ही बात कहता:- जिंदगी में जो होता है अच्छे के लिए होता है|

मेरे साथ यह होना भी जरूरी था क्योंकि मेरा सपना था कि मैं दुनिया घूमूं और स्नो ग्लाइडिंग का अपना शौक पूरा करूं| लेकिन मेरे पैर जवाब दे देते थे, खासकर ज्यादा ठंड में अकड़ जाते थे| खून जमने लगता था लेकिन अब मेरे पैर रबर के हैं|

मैं जितनी देर तक चाहूं बर्फ में रह सकता हूं और सिर्फ यही नहीं अब मुझे अपने जूतों के साइज की भी चिंता नहीं| क्योंकि मेरे पास हर साइज के पैर जो मौजूद हैं|

अपने दोनों पैर खोने के बाद भी मोहित एक जिंदादिल स्नोग्लाइडर के साथ-साथ एक sports trainer भी बना जो देश के विकलांग लोगों को sports सिखाने का काम करता था|

सीख:-
अगर आप में आत्मविश्वास है तो बड़ी से बड़ी समस्या भी मामूली है|

 

A Success Story in Hindi

एक अंधे की सफलता की कहानी

एक गांव में राहुल नाम का एक लड़का रहता था जो जीवन में हार मान चुका था| वह life में जो कुछ भी करता था, उसको अपनी हार पहले से ही नजर आती थी| स्कूल में अध्यापक और अन्य विद्यार्थी भी उसकी मजाक उड़ाते थे| वह अंधेरे कमरे में अक्सर रोता रहता था|

एक दिन उसकी सिसकती हुई आवाज को सुनकर एक अंधा आदमी उसके पास आया और पूछा, ‘तुम क्यों रो रहे हो’|

राहुल ने उस आदमी को सारी बात बताई|

यह सुनकर वह आदमी जोर-जोर से हंसा और बोला, तुम्हें पता है, ‘जब मैं पैदा हुआ और लोगों ने देखा कि इस बच्चे की तो आंखें ही नहीं है, तो उन्होंने मेरे माता-पिता को मुझे मार देने की सलाह दी’|

उन लोगों ने मेरे माता-पिता को कहा की यह तो अंधा है| यह जीवन भर तड़पता रहेगा,  इसलिए इसे मार देना ही अच्छा होगा| लेकिन मेरे माता-पिता ने उन लोगों की सलाह नहीं मानी| उन्होंने मुझे एक विशेष स्कूल में भेजा और  मुझे पढ़ाया-लिखाया| जब मैं कॉलेज में admission लेने गया तो कॉलेज प्रशासन ने मेरा admission करने से मना कर दिया|

फिर मैंने विदेशी विश्वविद्यालय का फॉर्म भरा और MIT की स्कॉलरशिप पर graduation और post graduation की डिग्री ली| लेकिन जब मैं वापस आया तो फिर मुझे महसूस हुआ कि नेत्रहीन(blind) होने के कारण मुझे कोई नौकरी नहीं देना चाहता|

फिर मैंने अपनी कंपनी शुरू की| इसलिए नहीं कि मेरे पास बहुत पैसा था यह मेरे पास कोई अनोखा आईडिया था| मैंने कंपनी इसलिए शुरू की क्योंकि मेरे पास और कोई चारा ही नहीं था| लेकिन आज मुझे खुशी है कि आज मैं अपनी कंपनी के जरिए मेरे जैसे 5000 लोगों को नौकरी दे पाया हूं|

जीवन में जीत और हार आपकी सोच पर ही निर्भर करती है,
मान लो तो हार है और ठान लो तो जीत है|

आदमी की बात को सुनकर राहुल ने पूछा आप की कहानी से मेरा क्या वास्ता?

वह आदमी बोला, जैसे आज लोग तुम्हारी हंसी उड़ाते हैं, वैसे ही जिंदगी भर लोगों ने मेरी भी निंदा की, मेरा भी मजाक उड़ाया| लेकिन मैंने खुद को कभी कमजोर नहीं समझा|

जब दुनिया मुझे नीची नजरों से देखती थी और यह कहती थी कि तुम जिंदगी में कुछ नहीं कर सकते| तब मैं उनकी आंखों में आंखें डाल कर बोलता था कि मैं कुछ भी कर सकता हूं| जैसे मैंने इतना सब कुछ किया वैसे ही तुम भी बहुत कुछ कर सकते हो| इसलिए हिम्मत मत हारो| दुनिया क्या कहती है, इस बात की परवाह मत करो|

सीख:-
दुनिया आपको कैसे देखती है यह महत्वपूर्ण नहीं है, लेकिन आप खुद को कैसे देखते हैं, यह सबसे ज्यादा महत्वपूर्ण है
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Short Moral Stories in Hindi #1- मेंढक और लड़के

एक दिन कुछ लड़के एक तालाब के पास खेल रहे थे| उस तालाब में मेंढको का एक परिवार रहता था| लड़कों ने अपने मजे के लिए तालाब में पत्थर फेंकने शुरू कर दिए| और जब पानी उछलता था, तो वह लड़के भी खुशी से उछलने लगते थे|

जैसे ही पत्थर पानी में जाता था, तो बेचारे मेंढक दर्द की वजह से कांपने लगते थे| अंत में एक साथी मेंढक बाहर आया और उसने प्रार्थना की| ‘बच्चों ऐसा खतरनाक खेल मत खेलो’| जिससे तुम्हें आनंद का अनुभव हो रहा है, वही खेल हमारे लिए दुखदाई मृत्यु का कारण बन रहा है|

सीख:-
हमें दूसरों के जीवन से खिलवाड़ करके अपना मनोरंजन नहीं करना चाहिए|

 

Short Moral Stories in Hindi #2 – बकरी और चरवाहा

एक दिन एक चरवाहा बकरियों के झुंड के साथ चारागाह गया| वहां एक बकरी झुंड से भटक गई| चरवाहे ने उस बकरी को समूह में लाने की कोशिश की और आवाज़ लगाई| लेकिन बकरी ने उसकी आवाज नहीं सुनी, फिर उसने बकरी पर पत्थर फेंका|

पत्थर के मारने से बकरी का एक सींग टूट गया| इस बात से घबराकर चरवाहे ने बकरी से कहा कि- इस बात को मालिक को न बताएं कि क्या हुआ था| बकरी ने इस बात का जवाब दिया| तुम तो बड़े ही बेवकूफ चरवाहे हो| जब सींग टूट ही गया है, तो यह सींग खुद ही बता देगा कि क्या हुआ था चाहे मैं कितनी भी शांत क्यों ना रहूं|

सीख:-
उन चीजों को छुपाने का प्रयास कभी ना करें जो छुप नहीं सकती हैं|

 

Short Moral Stories in Hindi #3 – अबाबील और कौवा

एक बार एक अबाबील और कौए के बीच उनके पंखों की सुंदरता को लेकर बहस हो गई| अबाबील ने कौवे से घमंड से कहा कि ” मेरे चमकदार पंखों को देखो| यह कितने खूबसूरत हैं| और जरा अपने काले, बेढंगे पंखों को देखो| यह कितने बुरे पंख हैं| मेरे लिए जीवन में खूबसूरती ही सब कुछ है|”

यह सुनकर कौआ मुस्कुराया और उसने अबाबील से कहा, “तुम खूबसूरत हो सकते हो, लेकिन तुम्हारी खूबसूरती केवल बसंत ऋतु में ही रहती है| तुम तो गर्मी बर्दाश्त ही नहीं कर पाते हो| जबकि मुझे देखो, मेरे पंख मुझे ठंड और गर्मी दोनों से बचाते हैं|”

सीख:-
सुख के साथी, सच्चे साथी नहीं होते हैं|

 

Short Moral Stories in Hindi #4 – मुर्गा, बिल्ली और चूहा

एक बार एक चूहे ने दुनिया देखने के लिए अपने बिल से बाहर कदम रखा| जब वह वापस आया तो अपने रोमांचक अनुभव को बताने के लिए वह अपनी मां के पास गया|

चूहे ने कहा:-‘ मां, मैंने एक जानवर देखा, जो एक राक्षस की तरह लग रहा था| उसके सिर पर लाल रंग की कलगी थी और वह मेरे पास बहुत ही तेजी से दौड़ कर आया| लेकिन मैं वहां से भाग गया| फिर मैंने एक और जानवर को देखा जिसकी खाल बहुत ही मुलायम थी और मेरी तरफ प्रेम से देख रहा था|

मां ने कहा बेटा, वह खतरनाक जानवर एक मुर्गा था| लेकिन मुलायम खान वाला जानवर लोगों को खाने वाली एक बिल्ली थी| इसलिए भगवान को धन्यवाद दो कि तुम अपना जीवन बचाने में कामयाब रहे|

सीख:-
बाहरी रंग रूप को देखकर किसी पर भरोसा नहीं करना चाहिए|

 

Hindi Moral Stories for Kids

 

Short Moral Stories in Hindi #5 – किसान और सारस

एक सहारा दिन एक किसान ने अपने खेतों में जाल बिछाकर कई सारसों को पकड़ा| क्योंकि सारस(Cranes) को उसके खेतों में बोए हुए बीजों को खा जाते थे| उनके साथ उसने एक धनेश (Stork) को भी पकड़ा, जिसकी टांग जाल में फंसकर टूट गई थी|

उसने किसान से अनुरोध किया, कृपया मुझ पर तरस खाओ| मैं सारस नहीं हूं |मैं तो धनेश(विशेष खासियत वाली चिड़िया) हूं | इस बात का मुझे बिल्कुल भी पता नहीं था कि सारस खेत में बोए हुए बीजों को चुराने के लिए आते हैं|

किसान हंसा और उसने कहा:-‘ मैंने, तुम्हें चोरों के साथ पकड़ा है| इसलिए तुम्हारे साथ भी उसी तरह का व्यवहार होगा, जैसे एक चोर के साथ किया जाता है|’

सीख:-
बुरी संगत में रहने का नतीजा भी बुरा होता है|

 

Short Moral Stories in Hindi #6 – दो मटके

एक बार एक तांबे के मटके ने मिट्टी के मटके से दुनिया की यात्रा करने के लिए कहा| लेकिन मिट्टी के मटके ने कहा, ‘मेरे लिए तो यह बेहतर होगा कि मैं एक कोने में ही पड़ा रहूं’|

तुम तो जानते हो कि मैं कितना कमजोर हूं| मैं तो एक छोटे से झटके से ही टूट जाता हूं| इस बात पर तांबे के मटके ने कहा, ‘दोस्त, चिंता ना करो, मैं तुम्हारी देखभाल सही तरीके से करूंगा’|

यह सुनकर मिट्टी का मटका सहमत हो गया और दोनों यात्रा पर निकल पड़े| दोनों एक दूसरे का साथ देते हुए साथ चलते रहें| मिट्टी का मटका रास्ते में तांबे के मटके से टकराता रहा, ठोकरे खाता रहा और अंत में यह सहन न कर सका| कुछ दूर चलने के बाद मिट्टी का मटका टूट गया और हजारों टुकड़ों में बट गया|

सीख:-
हमेशा अपने बराबर के लोगों से ही दोस्ती करनी चाहिए|

 

Short Moral Stories in Hindi #7 – भेड़िया और गधा

एक बार एक गधा घास के मैदान में घास चर रहा था| तभी उसने एक भेड़िए को अपनी तरफ आते हुए देखा| गधे ने तुरंत ही लंगड़ा होने का नाटक किया| भेड़िए ने गधे से उसके लंगड़ेपन का कारण पूछा| गधे ने बताया कि वह एक झाड़ी से होकर गुजर रहा था तो उसके पैर में एक कांटा चुभ गया|

अब गधे ने भेड़िए से कांटा निकालने का अनुरोध किया| उसे खा जाने वाले भेड़िए ने गधे के अनुरोध को स्वीकार कर लिया| क्योंकि उसे लगा कि गधा तो अब कहीं भाग कर नहीं जा सकता है|

गधे ने अपनी टांग उठाई और भेड़िया सावधानीपूर्वक झुककर कांटे को देखने लगा| लेकिन तभी गधे ने भेड़िए के मुंह पर दुलत्ती मारी और कहा:-‘ तुम कसाई हो, कोई डॉक्टर नहीं!’

भेड़िया दुलत्ती की चोट खाकर धूल चाटने लगा और गधे ने सरपट दौड़ लगाकर अपनी जान बचाई|

सीख:-
मुसीबत के समय अपनी बुद्धि से काम लेना चाहिए|

 

Short Hindi Moral Story #8 – पैगंबर और उसके शिष्य

एक बार हजरत मोहम्मद साहब अपने दोस्तों और इमामों को मस्जिद में ले गए और उनसे पूछा:-” आपके पास क्या-क्या है?”

हजरत उमर ने कहा:- “मेरी औरत है, लड़के लड़कियां हैं और ऊंट वगैरह है|” सब कुछ गिनते-गिनते उसे बहुत देर हो गई| दूसरे लोगों ने भी इसी तरह उत्तर दिए|

जब हज़रत अली की बारी आई तो वह अपनी जगह से उठे और बोले:-” मेरा तो एक खुदा है और एक आप है, इसके अलावा मेरा कुछ नहीं|” हजरत मोहम्मद साहब को यही सुनना था|

सीख:-
संसार में भौतिक चीजों का कोई खास महत्व नहीं है| यह हमारे पास थोड़े समय के लिए ही होती हैं| जो इस दुनिया में जितना ज्यादा फंसा हुआ है वह उतना ही परेशान है|

 

Short Moral Stories in Hindi #9 – शाहजहां की विनम्रता

दोपहर का वक्त था| बादशाह शाहजहां को प्यास लगी| उन्होंने इधर उधर देखा| लेकिन कोई नौकर भी पास नहीं था, क्योंकि आमतौर पर पानी की सुराही भरी हुई पास ही रखी होती थी| पर उस दिन सुराही में भी पानी नहीं था|

बादशाह शाहजहां, एक कुएं के पास पहुंचे और पानी निकालने की कोशिश करने लगे| बादशाह जैसे ही बाल्टी पकड़ने के लिए आगे झुके तो कुए पर लगी हुई चकरी उनके माथे में जा लगी और खून बहने लगा|

किंतु गुस्सा करने की बजाय बादशाह ने कहा:-” शुक्र है! मेरे मालिक तेरा शुक्र है, जिस आदमी को कुएं से पानी भी निकालना नहीं आता, ऐसे बेवकूफ आदमी को आपने बादशाह बना दिया| यह आपकी रहमत नहीं है तो और क्या है?”

सीख:-
दुख आने पर हमें घबराना नहीं चाहिए बल्कि दुख में भी ईश्वर का शुक्र मनाना चाहिए|

 

Short Moral Stories in Hindi #10 – जैसा अन्न वैसा मन

एक बार एक ऋषि, अतिथि के तौर पर एक राजा के यहां पहुंचे| राजा ने उनका खूब आदर सत्कार किया और उन्हें भोजन कराया| भोजन करने के कुछ घंटों बाद ही ऋषि की मनोवृत्ति में अंतर आ गया और उन्होंने राजा का हार चुरा लिया|

अब राजा धर्म संकट में पड़ गया कि ऋषि पर दोष कैसे लगाएं?

काफी सोच विचार करने के बाद विद्वानों ने राय दी, “महाराज, अन्न का प्रभाव मन पर भी पड़ता है| हो सकता है कि राजकोष का यह अन्न ही दोषपूर्ण हो, इसलिए इसकी जांच कराई जाए”

राजा ने अन्न की जांच कराई तो पाया कि जिस अन्न से ऋषि का भोजन बनाया गया था| एक चोर से बरामद किया गया था| तब राजा की समझ में आया कि ऋषि का व्यवहार ऐसा क्यों हो गया था|

सीख:-
हमारी मानसिक चेतना और स्वस्थ भी वैसा ही हो जाता है, जैसा हम अन्न खाते हैं| यदि हमारा भोजन संतुलित नहीं है तो मन भी संतुलित नहीं होगा|
 

 

असली विजेता मोहन – A moral story in Hindi

जीतने का मतलब

एक गांव में मोहन नाम का लड़का रहता था| उसके पिताजी एक मामूली मजदूर थे| एक दिन मोहन के पिताजी उसको अपने साथ शहर ले गए| उनको एक मैदान साफ करने का काम मिला था जिसमें एक दौड़ प्रतियोगिता का आयोजन होना था|

मोहन मैदान देख कर बहुत खुश हुआ| उस दिन उसे भी दौड़ने का शौक चढ़ गया| जब यह दोनों गांव लौटे तो मोहन ने अपने पिता से जिद की कि हमारे गांव में भी दौड़ प्रतियोगिता का आयोजन होना चाहिए| मोहन के पिता ने गांव के प्रधान के सामने यह सुझाव रखा|

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कुछ ही दिनों में प्रतियोगिता की तैयारी शुरू हो गई और आसपास के सभी गांव के बहुत सारे बच्चे दौड़ में हिस्सा लेने के लिए आ गए|

मोहन के दादा जी सब शांति से देख रहे थे| हालांकि प्रतियोगिता बहुत कठिन थी| लेकिन मोहन ने ठान रखा था कि उसे जीतना ही है|सीटी बजते ही सारे प्रतिभागी रेस लाइन की तरफ दौड़ने लगे|

कड़क धूप और पथरीले रास्ते को पार करते हुए मोहन ने रेस जीत ली| पूरा मैदान तालियों से गूंज उठा| मोहन की एक के बाद एक जीत का सिलसिला शुरू हो गया|

मोहन के दादा जी मन ही मन यह देख कर बहुत दुखी होते थे| एक दिन दादाजी ने मोहन के लिए एक खास दौड़ का आयोजन किया| दौड़ के नाम पर मोहन खुशी-खुशी मैदान में आया|

दादाजी ने उससे कहा बेटा, हर रेस में जीतने के अलग-अलग तरीके होते हैं| सोच समझकर दौड़ना|मोहन को कुछ समझ नहीं आया|

आसपास के सभी गांव के लोग दौड़ प्रतियोगिता देखने आए थे|मोहन ने देखा कि इस प्रतियोगिता में उसके अलावा केवल दो ही प्रतिभागी थे| हमेशा की तरह सिटी बजते ही मोहन रेस लाइन की तरफ दौड़ा| वह लाइन तक पहुंचने ही वाला था कि उसने देखा कि बाकी के दोनों प्रतिभागियों ने अभी तक दौड़ना भी शुरू नहीं किया है|

मोहन ने देखा कि एक प्रतिभागी लंगड़ा है और दूसरा प्रतिभागी अंधा| मैदान में चुप्पी छाई हुई थी| मोहन अपनी जगह पर वापस गया और दोनों प्रतिभागियों के हाथ पकड़कर, धीरे-धीरे उन्हें रेस लाइन तक साथ में लेकर आया| तीनों प्रतिभागियों ने एक साथ रेस लाइन को पार किया| यह देखकर पूरा मैदान तालियों की गूंज से भर उठा|

मोहन के दादा जी बोले, आज मुझे यकीन हो गया है कि तुम असली विजेता हो|

सीख:-
जीवन की हर रेस में जीतना ही जरूरी नहीं होता है|
 

 

 विकास की नौकरी और बेवकूफ गधा

बेवकूफ गधा – A Donkey story

विकास जिस ऑफिस में काम करता था उसमें ऐसे लोग भी  थे जो विकास के अच्छे काम से बहुत चिढ़ते थे| एक दिन जब विकास खाना खा रहा था| तो उसे अपने पीछे वाली टेबल पर कुछ फुसफुसाहट सुनाई दी| टेबल के बीच में लकड़ी की एक दीवार थी|

विकास कान लगाकर सुनने लगा| उसने सुना कि उसके ऑफिस के 2 लोग प्रमोशन के बारे में कुछ बात कर रहे हैं| उसमें से एक ने कहा इस बार वह चाहे जो भी कर ले उसे प्रमोशन नहीं लेने दूंगा|

दूसरा बोला लेकिन ऐसा क्यों? इस पर पहला बोला, बॉस ने कहा है कि वह अगले महीने तक विकास को कोई ना कोई बहाना बनाकर बाहर निकाल देंगे|

अब विकास जल्दी-जल्दी खाना खा अपना काम करने लगा एक हफ्ता बीत गया| एक दिन बॉस ने विकास को अपने कमरे में बुलाया और और उससे पूछा:- विकास, आजकल तुम्हारे काम की speed कुछ कम हो गई है ऐसा क्यों है? क्या कोई खास बात है?

विकास को लगा कि अपने बारे में जो कुछ मैंने सुना था वह बात अब सच होने जा रही है| विकास  बोला, सर, मुझे पता है कि आप मुझे कंपनी से निकालना चाहते हैं|

विकास की इस बात को सुनकर बहुत परेशान हो गए और उन्होंने पूछा, यह बात तुम्हारे दिमाग में किसने डाली कि कंपनी तुमको निकालना चाहती है| विकास ने पूरी घटना अपने बॉस को सुनाई| बॉस बोले, तुम्हें एक कहानी सुनाता हूं|

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जंगल में एक गधा रहता था औरवह शेर का बहुत अच्छा मित्र था| शेर हर रोज एक जानवर को खा जाता था लेकिन क्योंकि गधा उसका दोस्त था इसलिए शेर उसकी तरफ कभी भी नहीं देखता था|

लोमड़ी को यह बात हजम नहीं होती थी| एक दिन जब गधा एक पेड़ के नीचे आराम कर रहा था तो लोमड़ी और खरगोश पेड़ के पीछे जाकर बात करने लगे|

अब गधे से रहा नहीं गया| गधा  उनकी बातें सुनने लगा| लोमड़ी बोली, पता है, गधा अभी तक कुंवारा क्यों हैं?
क्योंकि जो भी गधी जंगल में आती है शेर उसे खा जाता है|

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गधे को इस बात से बड़ी ठेस पहुंची| लोमड़ी की वजह से गधे और शेर के बीच में दरार आ गई थी| एक दिन जब शेर अपने शिकार पर निकला तो गधा उससे जाकर बैठ गया और बोला मैं तुम्हें शिकार नहीं करने दूंगा |शेर ने उसे बहुत समझाया लेकिन गधा नहीं समझा|आखिरकार बेचारा गधा  शेर का शिकार बन गया|

बॉस हंसते हुए बोले, देखो विकास, लोमड़ी हर जगह मिलेगी, जो तुम्हारे काम को, तुम्हारे रिश्ते को खराब करने की कोशिश करेगी| यह तुम्हें तय करना है कि तुम क्या करोगे|

सीख:-
किसी की बात पर आंख मूंदकर भरोसा नहीं करना चाहिए| पहले उसे परखना जरूरी है|

 

महात्मा और खजूर

महात्मा और खजूर एक ऐसी Hindi moral story है जिससे जीवन में यह सीख मिलती है कि यदि मन का कहना मानोगे तो जीवन भर मन की गुलामी करनी पड़ेगी| एक महात्मा ने कैसे अपने मन को समझाया और कैसे अपने मन को वश में किया, यह इस कहानी के माध्यम से समझाया गया है|

एक बार एक महात्मा बाजार से होकर गुजर रहा था| रास्ते में एक व्यक्ति खजूर बेच रहा था| उस महात्मा के मन में विचार आया कि खजूर लेनी चाहिए| उसने अपने मन को समझाया और वहां से चल दिए| किंतु महात्मा पूरी रात भर सो नहीं पाया|

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वह विवश होकर जंगल में गया और जितना बड़ा लकड़ी का गट्ठर उठा सकता था, उसने उठाया| उस महात्मा ने अपने मन से कहा कि यदि तुझे खजूर खानी है, तो यह बोझ उठाना ही पड़ेगा|

महात्मा,थोड़ी दूर ही चलता, फिर गिर जाता, फिर चलता और गिरता| उसमें एक गट्ठर उठाने की हिम्मत नहीं थी लेकिन उसने लकड़ी के भारी भारी दो गट्ठर उठा रखे थे|

दो ढाई मील की यात्रा पूरी करके वह शहर पहुंचा और उन लकड़ियों को बेचकर जो पैसे मिले उससे खजूर खरीदने के लिए जंगल में चल दिया| खजूर सामने देखकर महात्मा का मन बड़ा प्रसन्न हुआ|

महात्मा ने उन पैसों से खजूर खरीदें लेकिन महात्मा ने अपने मन से कहा कि आज तूने खजूर मांगी है, कल फिर कोई और इच्छा करेगी| कल अच्छे-अच्छे कपड़े और स्त्री मांगेगा अगर स्त्री आई तो बाल बच्चे भी होंगे| तब तो मैं पूरी तरह से तेरा गुलाम ही हो जाऊंगा|

सामने से एक मुसाफिर आ रहा था| महात्मा ने उस मुसाफिर को बुलाकर सारी खजूर उस आदमी को दे दी और खुद को मन का गुलाम बनने से बचा लिया|

Moral of the story:
यदि मन का कहना नहीं मानोगे तो इस जीवन का लाभ उठाओगे यदि मन की सुनोगे तो मन के गुलाम बन जाओगे|

 

जीतने की जिद

एक गांव में कुसुम नाम की एक लड़की  रहती थी| कुसुम का चयन एयरफोर्स में हो गया था और इस बात को लेकर उसके गांव वाले बड़े आश्चर्यचकित थे| किसी ने सोचा भी नहीं था कि एक छोटे से गांव की कमजोर वर्ग की लड़की एक दिन पूरे गांव का नाम रोशन करेगी |

एक बार एयर फोर्स के कुछ अफसरों का  जत्था एवरेस्ट की चढ़ाई के लिए जा रहा था| कुसुम को भी उसमें शामिल किया गया| हालांकि उसे पर्वतारोहण का कोई भी अनुभव नहीं था| कुसुम कड़ी मेहनत करने लगी और कुछ ही महीनों में वह अपने दोस्तों के साथ एवरेस्ट के पहले बेस कैंप पर पहुंच गई|

एवरेस्ट पर चढ़ने के लिए पांच अलग-अलग पड़ाव पार करने होते हैं| उसने हार नहीं मानी और मजबूती से चलती रही| पर अंतिम पड़ाव पर आकर वह बहुत थक गई और उसे सांस लेने में दिक्कत होने लगी| उसकी टीम के लीडर ने उसे वहीं से लौट जाने का आदेश दिया|

कुसुम ने जिंदगी में पहली बार हार का सामना किया था| वह जब वापस अपने गांव लौटी तो गांव वालों ने उसका बड़ा अपमान किया और उसकी मजाक उड़ाई |उस दिन उसने तय कर लिया कि जब तक मैं एवरेस्ट की चढ़ाई नहीं करूंगी, जिंदगी में और कुछ नहीं करूंगी|

लंबी छुट्टी लेकर कुसुम अपने पैसों से एवरेस्ट पर चढ़ाई करने के लिए पहुंच गई| इस बार जोश कई गुना ज्यादा था| उसने जीवन भर की सारी जमा-पूंजी इस पर लगा दी थी| एक बार फिर  अंतिम पड़ाव तक पहुंच गई लेकिन इस बार भी अंतिम पड़ाव पर जाकर उसके हौसले पस्त होने लगे ,साथ ही मौसम भी खराब होने लगा|

अब कुसुम के सामने चुनौतियां ज्यादा थी| जिंदगी की पूरी कमाई, गांव वालों की इज्जत, माता-पिता का विश्वास और अपने भीतर की खुशी एक सवाल बन कर उस की आंखों के सामने तैर रही थी| उसने तय किया कि चाहे कुछ भी हो जाए अब वापस नहीं लौटना है |

अगले 8 घंटे उसकी जिंदगी के सबसे कठिन समय थे| लेकिन फिर भी वह डटी रही और अंत में वह एवरेस्ट की चोटी तक पहुंच गई| जब कुसुम वापस अपने गांव लौटी तो गांव वालों ने दिल खोलकर उसका स्वागत किया और उससे माफी भी मांगी|

सीख:-
लोग हमारी नहीं, बल्कि हमारी उपलब्धियों की कद्र करते हैं|

 

Hindi Moral Story # बादशाह की दाढ़ी

बादशाह कासिम अपनी प्रजा की हिफाजत के लिए रात को भेष बदलकर अपने राज्य में घूमता था| एक बार बादशाह कासिम को 5 चोर मिले|

बादशाह ने उनसे पूछा:- “आप कौन हैं?” उन्होंने जवाब दिया:- “हम चोर हैं|” फिर एक चोर ने बादशाह से पूछा कि आप कौन हैं? बादशाह ने कहा:-” मैं भी चोर हूं|”

इस पर चोरों ने बादशाह को अपने गिरोह में शामिल कर लिया| अब चोरी करने की सलाह हुई, लेकिन चोरी करने से पहले यह तय हुआ कि उन्हें अपने में से किसी एक को सरदार बनाना चाहिए|

इस बात पर सभी चोर सहमत हो गए| सरदार चुनने के लिए जरूरी था कि सब अपना-अपना गुण बयान करें ताकि जिसका गुण सबसे अच्छा हो उसे ही सरदार चुना जाए|

पहले चोर ने कहा कि मैं ऐसी रस्सी का ऐसा फंदा लगाता हूं कि एक बार में ही रस्सी फंस जाती है|

दूसरे ने कहा मैं सेंध लगाना बहुत अच्छी तरह से जानता हूं|

तीसरे चोर ने कहा कि मैं सूंघकर बता सकता हूं कि माल कहां पर दबा हुआ है|

चौथे ने कहा कि मैं जानवरों की बोली समझ सकता हूं कि वह क्या कहते हैं|

पांचवें चोर ने कहा कि मैं जिसको रात में एक बार देख लेता हूं, दिन में भी उसकी पहचान कर लेता हूं|

बादशाह सोच रहा था कि मैं क्या कहूं? जब सारे चोर अपना अपना गुण बयान कर चुके, तब बादशाह ने कहा कि मेरी दाढ़ी में यह कमाल है कि चाहे कितने भी बड़े अपराध करने वाले चोर-डाकू फांसी पर चढ़ रहे हो, यदि मैं जरा सी दाढ़ी हिला दूं तो सब आजाद हो जाते हैं|

चोरों ने जब बादशाह का यह गुण सुना तो उनको यह गुण सबसे अच्छा लगा|उन्होंने बादशाह को ही अपना सरदार बना लिया| पास में ही उस बादशाह का महल था| उन चारों में यह सलाह हुई कि आज बादशाह के महल में चोरी करेंगे| बादशाह भी मजबूर था| जब वह सारे चोर महल की ओर चलने लगे तो रास्ते में एक कुत्ता भौंकने लगा|

चोरों ने चौथे चोर से पूछा कि यह क्या कहता है? उस चोर ने कहा कि यह कुत्ता कहता है कि हम में से एक बादशाह है| यह सुनकर सब जोर जोर से हंस पड़े, बादशाह भी हंस पड़ा|

महल में पहुंचकर पहले चोर ने फंदा लगाया| सारे चोर और बादशाह ऊपर चढ़ गए| दूसरे चोर ने सेंध लगाई तीसरे चोर ने सूंघकर खजाने का पता लगाया और चोरी करने के बाद सभी चोरों ने माल आपस में बांट लिया और अपने अपने घरों को चल दिए|

अगले दिन बादशाह ने अपने आदमी भेजकर चोरों को पकड़वा लिया और फांसी का हुक्म दे दिया| जब फांसी लगने लगी तो पांचवा चोर सामने आया और बादशाह से कहने लगा:-” हुजूर! मैंने आपको पहचान लिया है क्योंकि आप ही रात को हमारे साथ थे|

हम पर रहम करो और हमें फांसी से बचा लो| हम सच्चे दिल से संकल्प लेते हैं कि आज से कभी भी चोरी नहीं करेंगे बल्कि आपकी सेवा में सारी उम्र लगा देंगे|”

बादशाह ने अपनी दाढ़ी हिला दी और दाढ़ी हिलाते ही पांचो चोर फांसी के तख्ते से उतार लिए गए| वे पांचों चोर हमेशा के लिए आजाद होकर बादशाह की सेवा में लग गए|

सीख:-
ईश्वर भी किसी न किसी रूप में आकर यह हमारे जैसा बन कर हमें हमेशा सीधे रास्ते पर चलने के लिए प्रेरित करता है|

 

New Moral Stories in Hindi

 

राजा की महानता  – एक प्रेरणादायक कहानी

एक राजा अपनी प्रजा का हाल चाल जानने के लिए गांव में घूम रहा था| घूमते-घूमते उसके कुर्ते का बटन टूट गया| राजा ने मंत्री से कहा कि पता करो इस गांव में कौन दर्जी है जो मेरे कुर्ते का बटन लगा सकता है|

मंत्री को पता चला कि गांव में एक ही दर्जी है जिसका नाम है सुखीराम| उसे राजा के सामने ले जाया गया| राजा ने कहा कि तुम मेरे कुर्ते का बटन लगा सकते हो| सुखीराम ने कहा, हुजूर यह कोई मुश्किल काम थोड़े ही है, यह कार्य तो मैं रोज करता हूं|

सुखीराम ने एक बटन लिया और धागे से राजा के कुर्ते का बटन लगा दिया| टूटा हुआ बटन राजा के पास ही था| इसलिए दर्जी को केवल अपने धागे का इस्तेमाल करना पड़ा|

राजा ने दर्जी से पूछा कि कितने पैसे दूं? उसने कहा महाराज, रहने दो|

राजा ने फिर से दर्जी को कहा, बोलो, कितनी मुद्राएं दे दूं?
सुखीराम ने सोचा कि 2 रुपए मांग लेता हूं| फिर मन में सोचा कि कहीं राजा यह न सोच ले कि यह बटन लगाने के बदले में मुझसे 2 रुपए ले रहा है तो गांव वालों से कितना लेता होगा|

उसने राजा से कहा कि महाराज ,आपको जो भी उचित लगे वह दे दो| राजा ने मंत्री से कहा इस दर्जी को 2 गांव दे दो| कहां दर्जी सिर्फ 2 रुपए की मांग कर रहा था और कहां राजा ने 2 गांव दे दिए| सुखीराम ने प्रसन्नतापूर्वक दोनों गांव की जागीर कबूल कर ली|

सीख:-
हम जब ईश्वर पर सब कुछ छोड़ देते हैं तो वह अपने हिसाब से देते हैं हम सिर्फ मांगने में कमी कर जाते हैं देने वाला तो पता नहीं क्या देना चाहता है|

 

ज्योतिषी और सुकरात

यूनान के प्रसिद्ध दार्शनिक सुकरात एक बार अपने शिष्यों से बातें कर रहे थे| उसी समय एक ज्योतिषी(Astrologer) वहां पहुंचा| उसका दावा था कि वह चेहरा देखकर व्यक्ति के चरित्र के बारे में बता सकता है|

यह तो हम सब लोग जानते ही हैं कि सुकरात जितने अच्छे दार्शनिक(philosopher) थे| सुंदरता में वह उतने ही बदसूरत लगते थे| पर लोग उन्हें उनके सुंदर विचारों की वजह से मानते थे| लोगों के लिए सुकरात का रंग रूप कोई मायने नहीं रखता था|

ज्योतिषी सुकरात (Socrates) का चेहरा देखकर कहने लगे इसके नथुनों की बनावट बता रही है कि इस व्यक्ति में क्रोध की भावना प्रबल है| यह सुनकर सुकरात के शिष्य नाराज होने लगे, पर सुकरात ने उन्हें समझाया और ज्योतिषी को अपनी बात कहने का पूरा मौका दिया|

फिर ज्योतिषी आगे कहने लगा, इसके सिर की आकृति बताती है कि यह निश्चित रूप से लालची इंसान होगा| इसकी ठोड़ी (Chin) की रचना कहती है कि यह बिल्कुल सनकी आदमी है| इसके होंटो और दांतो की बनावट के अनुसार यह व्यक्ति हमेशा देशद्रोह करने के लिए प्रेरित रहता है|

यह सब सुनकर सुकरात ने ज्योतिषी को इनाम देकर भेज दिया| इस बात पर सुकरात के शिष्य आश्चर्यचकित रह गए|

सुकरात ने उनकी जिज्ञासा शांत करने के लिए कहा, ज्योतिषी ने जो कुछ मेरे बारे में बताया वह सब दुर्गुण(negative points) मेरे अंदर हैं और मैं उन्हें accept करता हूं|

परंतु ज्योतिषी से एक गलत अवश्य हुई है और वह यह है कि उसने मेरे विवेक की शक्ति पर ज़रा भी ज़ोर नहीं दिया| उन्होंने नहीं बताया कि मैं अपने विवेक से इन सब दुर्गुणों पर अंकुश लगाए रखता हूं| यह बात ज्योतिषी बताना भूल गए|

सीख:-
इस दुनिया में कोई भी व्यक्ति सर्वगुण संपन्न नहीं है| हम सबके अंदर बहुत सी कमियां हैं|लेकिन यदि हम उन कमियों को अपने जीवन से निकाल दें और अपने मन पर अंकुश लगा ले तो हम कठिन से कठिन परिस्थितियों को भी आसान बना सकते हैं|

 

 हंस और मेंढक

एक बार एक हंस (Swan) एक समुद्र से उड़कर दूसरे समुद्र की ओर जा रहा था| वह रास्ते में थक कर एक कुएं के किनारे बैठ गया| उस कुएं के अंदर एक मेंढक रहता था|

उस मेंढक ने हंस को देखकर पूछा:-” भाई! तुम कौन हो और कहां से आए हो?”

हंस ने जवाब दिया:-” मैं समुद्र के किनारे रहने वाला एक पक्षी हूं और मोती चुनकर खाता हूं|”

तब मेंढक ने पूछा कि समुद्र कितना बड़ा है?

हंस ने कहा:- ‘बहुत बड़ा है|’

मेंढक ने थोड़ी दूर पीछे हट कर कहा कि इतना बड़ा होगा?

हंस ने कहा:-” नहीं, बहुत बड़ा|”

मेंढक ने थोड़ा सा चक्कर लगाकर पूछा:-‘ इतना बड़ा?’

हंस ने कहा कि समुद्र इससे भी कहीं बड़ा होता है|

तब मेंढक बोला:-” तू झूठा है, बेईमान है| इससे बड़ा तो हो ही नहीं सकता|”

हंस ने सोचा कि इस मुर्ख को समझाने से अच्छा है कि यहां से प्रस्थान किया जाए और हंस वहां से अपने मार्ग की ओर चल दिया|

सीख:-
जो बात हमारी समझ से बाहर होती है उसको हम अक्सर मानने के लिए तैयार नहीं होते हैं|

 

चुनौतियों को देखने का नजरिया

एक बार एक महिला अपने कुछ दोस्तों के साथ होटल में खाना खाने गई| होटल कोई ज्यादा बड़ा नहीं था| यह है ढाबे जैसा था|सब लोग बैठ गए और खाना खाने लगे|

तभी कहीं से एक कॉकरोच उड़कर उस महिला के कंधे पर आकर बैठ गया बस फिर क्या था महिला चीखने चिल्लाने लगी|
उसे देखकर उसके दोस्त ही नहीं बल्कि होटल के और लोग भी चिल्लाने लगे|

महिला की चीख पुकार और उछल-कूद देखकर कॉकरोच ने फिर उड़ान भरी और इस बार दूसरी टेबल पर बैठी एक महिला के कान पर जाकर बैठ गया| पिछली बार की तरह इस बार भी महिला चीखने चिल्लाने लगी|

वहीं पीछे एक वेटर खड़ा था जो सब कुछ देख रहा था| जब तक वह कुछ समझता, कॉकरोच फिर से उड़कर वेटर की नाक पर जाकर बैठ गया|

लेकिन वेटर नहीं चिल्लाया वह एकदम स्थिर होकर खड़ा हो गया और उसने कॉकरोच को भी स्थिर किया|फिर धीरे से उसने अपना हाथ उठाया और कॉकरोच को हाथ से पकड़ कर होटल के बाहर फेंक दिया|

अब सोचने वाली बात यह है कि केवल कॉकरोच कि किसी के ऊपर बैठ जाने से होटल में इतनी हलचल मच गई| लेकिन कॉकरोच तो वेटर के ऊपर भी बैठा था| लेकिन वह एक दम शांत था और समस्या का हल निकाला|

अगर वेटर भी घबरा जाता और चीखने चिल्लाने लगता तो वह भी स्थिति को काबू नहीं कर पाता और समस्या का समाधान नहीं ढूंढ पाता|
इस कहानी से यही सारांश निकलता है कि हमारी सफलता इसी बात पर निर्भर करती है कि हम चुनौतियों के प्रति कैसी प्रतिक्रिया व्यक्त करते हैं|

Moral of the story:
चुनौती नहीं, उसके प्रति प्रतिक्रिया हमें सफल या विफल बनाती है|
 

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मालिक सब देखता है

एक बार एक महात्मा के पास दो आदमी ज्ञान लेने के लिए आए| महात्मा बहुत पहुंचे हुए थे| उन्होंने दोनों को एक-एक चिड़िया दे दी और कहा:-” जाओ, इन चिड़ियाओं को ऐसी जगह मार कर लाओ जहां कोई और ना देखे|”

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उनमें से एक तो तुरंत ही पेड़ की ओट में जाकर उस चिड़िया को मार कर ले आया| जो दूसरा व्यक्ति था वह किसी सुनसान जगह पर चला गया|

जब वह उस चिड़िया को मारने ही वाला था, वह अचानक रुक गया और सोचने लगा-‘ जब मैं इसे मारता हूं तो यह मुझे देखती है और मैं भी इसे देखता हूं| तब तो हम दो हो गए और तीसरा ईश्वर भी यह सब कुछ देख रहा है| महात्मा का आदेश है कि इस चिड़िया को वहां मारना है जहां कोई और ना देखें|’

आखिर यह सोच-सोचकर उस चिड़िया को महात्मा के पास जीवित ही ले आया और बोला:-” महात्मा जी! मुझे तो ऐसी कोई जगह नहीं मिली जहां कोई नहीं देखता हो, क्योंकि ईश्वर हर जगह मौजूद है|”

महात्मा ने कहा:-” तुम ही ज्ञान के सही अधिकारी हो| मैं तुझे ज्ञान दूंगा|”

महात्मा ने उस दूसरे आदमी को वहां से डांट कर भगा दिया|

Moral of the story:
अगर हम ईश्वर को हर जगह हाजिर-नाजिर समझें तो हम कितनी ही बुराइयों से बच सकते हैं|

 

मौत का डर (सांप, बाज और चूहा)

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एक पेड़ पर दो बाज रहते थे दोनों में बड़ा प्रेम था दोनों शिकार की तलाश में निकलते थे और जो भी पकड़ लाते उसे शाम को मिल बैठकर खाते थे|
कभी किसी बाज को कुछ नहीं मिलता तो भी कोई परवाह नहीं करता आपस में मिल बांट कर खा लेते थे|

बहुत दिन से यही क्रम चल रहा था| एक दिन दोनों शिकार पकड़ कर लौटे, एक की चोंच में चूहा था और दूसरे की चोंच में सांप|

दोनों की चोंच में शिकार तब तक जीवित थे| पेड़ पर पहुंचकर दोनों बाद बैठ गए उन्होंने पकड़ ढीली की| सांप ने चूहे को देखा और चूहे ने सांप को देखा|

सांप चूहे को देख कर उसे अपना भोजन समझकर जीभ लपलपाने लगा और चूहा सांप के प्रयत्नों को देखकर हरकत में आ गया| वह बाज के पास छुपने की कोशिश करने लगा|

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उस दृश्य को देखकर एक बाज गंभीर हो गया दूसरे ने उससे पूछा, दोस्त, किस चिंतन-मनन में डूब गए हो|पहले बाज ने अपने पकड़े हुए सांप की ओर संकेत करते हुए कहा यह कैसा मूर्ख प्राणी है|

जीभ के स्वाद के आगे यह मौत को ही भूल बैठा है| दूसरे बाज ने अपने शिकार, चूहे की आलोचना करते हुए कहा और इस नासमझ को देखो| भय(डर) इसे प्रत्यक्ष मौत से भी अधिक डरावना लगता है|

उस पेड़ के नीचे एक मुसाफिर आराम कर रहा था उसने दोनों की बातें सुनी और एक लंबी सांस छोड़ते हुए बोला:-

हम लोग भी तो सांप और चूहे की तरह स्वाद और भय को बड़ा समझते हैं मौत को तो हम भी भूले रहते हैं

Moral Stories in Hindi

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फकीर और घायल कुत्ता

एक बार एक फकीर हज यात्रा के लिए जा रहा था तो उसने रास्ते में एक कुत्ते को जख्मी हालत में देखा| उसके चारों पांव पर से गाड़ी गुजर गई थी| और वह चल नहीं सकता था|

फकीर को रहम आ गया, लेकिन उसने सोचा कि मैं तो काबे को जा रहा हूं| इसलिए इसको कहां लिए फिरूंगा| फिर फकीर को ख्याल आया कि लेकिन इसका यहां कौन है? कौन इसकी मदद करेगा? और फकीर के मन में दया आ गई|

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फकीर ने कुत्ते को किसी कुए पर ले जाने के लिए उसे उठा दिया ताकि पानी से उसके जख्मों को धो कर उस पर पट्टी बांध दें|

फकीर को इस बात की भी चिंता नहीं थी कि कुत्ते के जख्मों से बहुत खून बह रहा है और उसके कपड़े खराब हो जाएंगे|

उस समय वह एक रेगिस्तान से गुजर रहा था| वहां उसने एक वीरान कुआं देखा| परंतु उस कुवे से पानी निकालने के लिए कोई रस्सी या डोल वगैरह नहीं था| उसने दो चार पत्ते इकट्ठे करके एक दोना बनाया| अपनी पगड़ी से बांधकर उसे कुएं से लटकाया|

पानी, कुएं में बहुत नीचे था| दोना वहां तक पहुंच नहीं सका| उसने साथ में अपनी कमीज बांध दी, लेकिन दोना फिर भी पानी की सतह तक नहीं पहुंच पाया| उसने इधर उधर देखा लेकिन कोई नजर नहीं आया|

फिर उस फकीर ने अपनी सलवार उतार कर बांध दी| तब वह दोनों पानी तक पहुंच गया| उसने दो चार दोने भरकर कुत्ते को पिलाये|पानी पीते ही कुत्ते को होश आ गया|

फकीर ने कुत्ते के जख्मों को भी पानी से धोकर साफ कर दिया और कुत्ते को उठाकर चल दिया| रास्ते में एक मस्जिद थी| उस फकीर ने मुल्ला जी से कहा कि तुम इस कुत्ते का ख्याल रखना| मैं काबे को जा रहा हूं| आकर इसे ले लूंगा|

रास्ते में जाते जाते उसको रात हो गई| जब वह रात को सोया तो एक आकाशवाणी हुई:-” ऐ नेक फकीर! तेरा हज कुबूल हो गया है| अब चाहे तुम हज पर जाओ या मत जाओ यह तुम्हारी मर्जी है”|

Moral of the story:
बेजुबान जानवर भी उस खुदा ने ही बनाए हैं, उनकी रक्षा करना बहुत ऊंची गति की बात है|
 
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सबसे बड़ा पहाड़
 बादशाह के खाली हाथ
स्वामी दयानंद की प्रेरणादायक कहानी  – गालियों के बदले फल
 

गुरु नानक देव जी और गरीब की रोटी

गुरु नानक देव जी (Guru Nanak Dev Ji) के समय एक प्रतिष्ठित व धनी व्यक्ति रहता था जिसका नाम मलिक भागो था| एक दिन उसने अपने पिता का श्राद्ध किया| दूर-दूर से संत महात्मा बुलाए गए और भोजन खिलाया गया, ताकि उसे धर्म लाभ मिल सके|

उन दिनों गुरु नानक देव जी भी उस स्थान पर आए हुए थे| गुरु नानक देव जी एक बढ़ई (लालो) की विनती करने पर वहां आए थे और उन्हीं के घर का खाना खाते थे|

किसी व्यक्ति ने मलिक भागों से शिकायत की कि यहां एक महात्मा आए हुए हैं परंतु वह एक बढ़ई के घर का खाना खाते हैं|

जब मलिक भागों को इस बात का पता चला कि लालो के घर एक महात्मा ठहरे हुए हैं तो उसमें अपने आदमी भेज कर गुरु नानक और उनके साथियों को भोजन पर आमंत्रित किया| परंतु गुरु साहिब ने उनके निमंत्रण को ठुकरा दिया|

मलिक भागो ने सोचा कि जब तक सभी महात्मा उसके घर का भोजन नहीं खा लेंगे तब तक उसका भोज अधूरा रहेगा| आखिर में गुरु नानक देव जी मलिक भागों के घर आ गए और लालो भी उनके पीछे-पीछे वहां आ गया|

मलिक भागो ने गुरु साहिब से पूछा:-” आप ब्रह्म भोज में क्यों नहीं आए थे महाराज?”

गुरु साहिब ने कहा:-” ला मालिक! अब खिला दे|”

जब गुरु साहिब ने पीछे पलट कर देखा कि लालो बढ़ई खड़ा है, तो गुरु साहिब ने उससे कहा:-“लालो! तू भी अपनी रोटी ले आ|”

लालो दौड़कर गया और कुछ रोटी तथा बिना नमक का साग ले आया| उधर मलिक भागों के आदमी पूरी कचोरी और अन्य पकवान ले आए|

गुरु साहिब ने अपने दाहिने हाथ में रोटी और उसके ऊपर साग रखा हुआ था तथा बाएं हाथ में पूरी कचोरी पकड़ी हुई थी| उन्होंने सबके सामने उनको निचोड़ा तो लालो की रोटी से दूध निकला और मलिक भागों की पूरी कचोरी से खून|

गुरु साहिब ने कहा:-” देखो मलिक! मैंने तेरा भोज क्यों नहीं खाया था| यह ब्रह्मभोज नहीं बल्कि लोगों का खून है| ब्रह्मभोज तो हमेशा लालो के घर का ही होता है|”

 सीख(Moral):
सही रास्ते से कमाए हुए धन से ही बरकत होती है| नेक कमाई के बिना परमार्थ में कामयाबी नहीं मिलती|

 

Inspirational Hindi Stories

 

खुश रहने का राज – एक प्रेरणादायक कहानी

एक जंगल में एक ऋषि रहते थे| लोग अपनी समस्याएं लेकर आते थे और ऋषि उनका समाधान करते थे| एक बार एक व्यक्ति ने ऋषि से पूछा, ‘ गुरुदेव’, खुश रहने का क्या राज है?

ऋषि ने उससे कहा, ‘ तुम मेरे साथ जंगल में चलो, वहीं पर मैं तुम्हें खुश रहने का राज बताता हूं’| और वह दोनों जंगल की ओर चल दिए| रास्ते में ऋषि ने एक बड़ा सा पत्थर उठाया और उस व्यक्ति को दे दिया और कहा, इसे पकड़ो और चलो|

उस व्यक्ति को समझ में नहीं आ रहा था कि मैं उनसे पत्थर उठाने के लिए क्यों कह रहे हैं| इसमें खुश रहने का क्या राज है? लेकिन उन्होंने कोई सवाल जवाब नहीं करते हुए ऋषि की बात को मानना ही उचित समझा और उस व्यक्ति ने पत्थर को उठाया और चलने लगा|

कुछ समय बाद उस व्यक्ति के हाथ में दर्द होने लगा, लेकिन वह चुप रहा और चलता रहा|

लेकिन जब चलते हुए बहुत समय बीत गया और उससे दर्द सहा नहीं गया, तो उसने कहा कि गुरुदेव अब मैं इस पत्थर का वजन नहीं उठा सकता हूं| मेरे हाथों में बहुत तेज दर्द हो रहा है|

ऋषि ने कहा कि पत्थर को नीचे रख दो| पत्थर को नीचे रखने से उस व्यक्ति को बड़ी राहत महसूस हुई|

तभी ऋषि ने कहा:-‘ यही है खुश रहने का राज’| व्यक्ति ने कहा, ‘मैं समझा नहीं गुरुवर’|

ऋषि ने कहा:- जिस तरह इस पत्थर को 1 मिनट तक हाथ में रखने पर थोड़ा सा दर्द होता है और 1 घंटे तक हाथ में रखने पर ज्यादा दर्द होता है| ठीक उसी तरह दुखों के बोझ को जितने ज्यादा समय तक हम अपने जीवन में रखेंगे उतने ही ज्यादा हम दुखी और निराश रहेंगे|

Moral of the story:

यह हम पर निर्भर करता है कि हम दुखों के बोझ को 1 मिनट तक उठाए रखते हैं या जिंदगी भर| अगर तुम खुश रहना चाहते हो तो दुख रूपी पत्थर को जल्दी से जल्दी नीचे रखना सीख लो और हो सके तो उस पत्थर को उठाओ ही मत|
 
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 नाम में क्या रखा है

एक बार एक संत अपनी कुटिया में विश्राम कर रहे थे| तभी उनका एक शिष्य ‘रामचंद्र’ गुस्से से भरा हुआ आया और बोला, गुरुदेव, लोग बड़े निर्लज्ज हो गए हैं| अब देखिए ना, आप की कुटिया के सामने एक व्यक्ति ने बाल काटने की दुकान खोली है और उसकी मूर्खता देखिए| दुकान का नाम रखा है ‘गुरुदेव सैलून’|

उसे फौरन बुलाकर नाम बदलने के लिए कहें| नहीं तो मैं उसकी दुकान में आग लगा दूंगा|

संत ने हंसकर कहा, तुम बेकार में ही विरोध कर रहे हो| हनुमान जी ने लंका इसलिए जलाई थी क्योंकि रावण ने सीता माता का हरण किया था| उनके पास उचित कारण था| लेकिन क्या इस सैलून वाले ने ऐसा किया है जो तुम उसकी दुकान जलाने की सोच रहे हो|

वह जो कर रहा है मुझे उसमें कोई बुराई नजर नहीं आती है| वह अपने परिवार का भरण पोषण करने के लिए काम कर रहा है| वह उसकी कर्म स्थली है और कर्म स्थली सदैव मंदिर के समान होती है| क्या तुम मंदिर को जलाओगे| तुम्हें दुकान के नाम पर आपत्ति क्यों है|

तुम्हारे पिता ने तुम्हारा नाम ‘रामचंद्र’ रखा| मगर प्रभु राम को तो तुम्हारे नाम से कोई आपत्ति नहीं है| रामचंद्र को गुरुदेव की बात समझ में आ गई और उसने गुरुदेव से क्षमा मांगी|

गुरुदेव ने कहा:-

कोई भी काम न तो छोटा होता है और ना ही बड़ा होता है| कर्तव्य पालन के लिए किए जा रहे किसी भी काम को हीन दृष्टि से नहीं देखना चाहिए|

 

एक गरीब किसान की कहानी

एक गांव में एक किसान रहता था| वह एक कुआं खोदना चाहता था| एक दिन उसने कुआं खोदना शुरू किया| कुछ फीट तक खुदाई करने पर भी जब उसे पानी नहीं दिखाई दिया तो वह निराश हो गया| फिर उसने दूसरी जगह खुदाई की किंतु पानी कहीं पर भी नहीं निकला|

इस तरह 6-7 जगहों पर उसने खुदाई की, किंतु उसे पानी नसीब नहीं हुआ| फिर वह बहुत दुखी और निराश होकर घर लौट गया|

अगले दिन उसने सारी बात एक बुजुर्ग व्यक्ति को बताई|उस व्यक्ति ने उसे समझाते हुए कहा:- “तुमने पांच अलग-अलग जगहों पर 6-7 फुट के गड्ढे खोदे लेकिन फिर भी तुम्हें कुछ हाथ नहीं लगा| यदि तुम अलग-अलग जगह पर खुदाई न करके एक ही स्थान पर इतना खोदते, तो तुम्हें पानी अवश्य मिल जाता|

तुमने धैर्य से काम नहीं लिया और थोड़ा-थोड़ा खोदकर अपना निर्णय बदल लिया| आज तुम एकाग्रता से एक ही स्थान पर गड्ढा खोदो और जब तक पानी दिखाई नहीं दे तब तक खोदना जारी रखना| तुम्हें सफलता जरूर मिलेगी|”

उस दिन किसान ने दृढ़ निश्चय करते हुए एक बार फिर खुदाई शुरू कर दी| लगभग 25-30 फुट की खुदाई हो जाने पर खेत से पानी निकल आया| यह देखकर किसान बहुत खुश हुआ और मन ही मन उस व्यक्ति का धन्यवाद करने लगा|

सीख:-
यदि किसी कार्य को पूरी एकाग्रता के साथ किया जाए तो उसमें सफलता जरूर मिलती है|

 

सोने का पिंजरा

एक शहर में कपड़े का एक बहुत बड़ा व्यापारी रहता था | आसपास के गांव के लोग उसकी दुकान पर कपड़ा खरीदने के लिए आते थे| सेठ कभी-कभी अपने ग्राहकों को उधार कपड़ा भी देता था | इसलिए सेठ को उगाही करने के लिए आसपास के गांव में जाना पड़ता था|

एक बार सेठ गांव में उगाही करने गया था तथा वहां से लौटते समय एक पेड़ के नीचे वह आराम करने बैठ गया |थोड़ी ही देर में उसे नींद आ गई | जब वह नींद से जागा तो उसने अपने आसपास तोतो का एक समूह देखा |

हरे रंग के और लाल चोंच  वाले तोते देखकर सेठ ने सोचा  यह तो बहुत ही सुंदर तोते हैं | यदि मैं एक दो तोते को साथ ले जाऊं तो परिवार के लोग बहुत खुश होंगे|

यह सोचकर सेठ ने एक तोता पकड़ लिया और उसे वह अपने साथ घर ले गया| सेठ ने घर पहुंचकर तोते के लिए सोने का एक पिंजरा बनवाया उसमें तोते के लिए एक बैठक और एक झूला रखवाया|

पानी पीने के लिए कटोरी और खाने के लिए एक तश्तरी भी रखी गई| अब तोता सोने के पिंजरे में आराम से रहने लगा | उसे प्रतिदिन अमरुद, मिर्च और उसकी पसंद की सभी वस्तुएं खाने के लिए दी जाने लगी|

घर के बच्चे तथा सेठ तोते से बातें भी करते थे और तोता थोड़ा बोलना भी सीख गया था | तोते के साथ बातें करने मैं सभी को बहुत आनंद आने लगा|

दूसरी बार जब सेठ उगाही करने निकला तो उसने तोते से कहा- ” तोताराम, मैं उगाही करने जा रहा हूं | लौटते समय मैं तेरे माता-पिता व सगे संबंधियों से मिलूंगा | तुझे उनके लिए कोई संदेश भेजना हो तो बता?”

तोते ने कहा-” सेठ जी, सबसे कहना, तोता भूखा नहीं है | तोता प्यासा भी नहीं है| तोता सोने के पिंजरे के अंदर आराम से रह रहा है |”

सेठ उगाही कर लौटते समय उसी पेड़ के नीचे आराम करने के लिए रुक गया | तभी तोते का एक समूह उस पर टूट पड़ा | वे उसे चोंच से मारने लगे और सेठ से पूछने लगे-” सेठ जी हमारा तोता कहां है और क्या कर रहा है?”

सेठ ने उन्हें शांत करते हुए कहा, ” तोता भूखा नहीं है, तोता प्यासा नहीं है| तोता सोने के पिंजरे के अंदर आनंद कर रहा है |”

यह सुनकर सभी तोते बिना कुछ बोले जमीन पर मुर्दों की तरह लुढ़क गए |यह देखकर सेठ उनके पास गया तोते को हिलाकर देखा | परंतु ऐसा लग रहा था जैसे सारे तोते आघात से मर गए हो|

सेठ जी घर आए| सेठ को देखते ही तोते ने अपने माता-पिता एवं सगे संबंधियों के बारे में पूछा|

सेठ ने कहा, ” तेरे माता-पिता और सगे संबंधियों को जब मैंने तेरा संदेश सुनाया तो सभी लुढ़क गए | क्या उन्हें आघात लगा होगा ?”

पिंजरे के तोते ने कोई जवाब नहीं दिया | सेठ की यह बात सुनकर वह स्वयं भी पिंजरे में नीचे गिर पड़ा| सेठ ने यह देखा तो उसे बहुत आश्चर्य हुआ|  उसने पिंजरे का दरवाजा खोला और तोते को हिला डुलाकर देखा|

सेठ को लगा कि यह तोता भी आघात से मर गया है| सेठ जी ने तोते को पिंजरे से बाहर निकाल कर थोड़ी दूर पर रख दिया| मौका देखकर तोता पंख फड़फड़ाता हुआ उड़ गया|

जाते-जाते उसने कहा, ” सेठ जी, मैं आपका आभारी हूं | मुझे अपने माता-पिता का संदेश मिल गया है| मैं उनसे मिलने जा रहा हूं| आपका पिंजरा सोने का था  | लेकिन था तो पिंजरा ही | मेरे लिए वह जेल थी |”

तोता उड़ता हुआ जंगल में अपने माता-पिता और सगे संबंधियों के पास पहुंच गया| उसे लौटकर आते हुए देखकर सभी बहुत खुश हुए|

अब तोता मुक्त वातावरण में सबके साथ आनंद से रहने लगा था|

 


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