Kabir Ke Dohe in Hindi with Meaning | कबीर के दोहे


Kabir Ke Dohe in Hindi

संत कबीर के सर्वश्रेष्ठ दोहे

इस अंक में हम संत कबीर जी के द्वारा रचित दोहे व् साखी (Kabir Ke Dohe in Hindi) प्रस्तुत कर रहे है जिनसे हमें जीवन में बहुत प्रेरणा मिलती है | अधिकांश दोहे उनके भावार्थ सहित लिखे गए है जिससे उनके अर्थ को समझने में आसानी होगी |

kabir das ke dohe
Kabir Ke Dohe in Hindi

जब मैं था तब हरी नही, अब हरी है मैं नाहिं |

सब अँधियारा मिटि गया , जब दीपक देख्या माहिं ||

Hindi Meaning :-इस दोहे में कबीर दास जी (Kabir Das) कहते हैं कि जब तक मुझ में अहंकार था तब तक मुझे परमात्मा की प्राप्ति नहीं हुई|

अहंकार के समाप्त होने पर अब मुझे परमात्मा की प्राप्ति हो गई है| जब मैंने ज्ञानरूपी दीपक प्रज्वलित किया तो मेरा अज्ञान रूपी सारा अंधकार दूर हो गया|

कहने का तात्पर्य यह है कि ज्ञान को प्राप्त करने के पश्चात मेरा अहम भाव दूर हो गया और अहं भाव के दूर होते ही मुझे परमात्मा के दर्शन हो गए|

बलिहारी गुरु आपने द्दोहाड़ी के बार|

जिनि  मनिष तै  देवता, करत न लागि बार ||

Hindi Meaning:- कबीरदास जी कहते हैं कि मैं अपने उन गुरु पर न्योछावर हूं और अपना शरीर बार बार उनको अर्पित कर देना चाहता हूं,

जिन्होंने मुझको अभिलंब मनुष्य से देवता बना दिया, अर्थात अपने ज्ञान द्वारा मुझको मनुष्य से देवता बनाने में जिन्हें जरा भी देर नहीं लगी|

Kabir ke pad

सतगुरु की महिमा अनंत , अनंत  किया उपगार |

लोचन अनंत उघाडिया , अनंत दिखावणहार     ||      

Hindi Meaning :- सतगुरु की महिमा का वर्णन करते हुए कबीरदास जी (Kabir Das) कहते हैं कि सतगुरु की महिमा अपार है उन्होंने मुझ पर अनेक उपकार किए हैं|

उन्होंने मुझको दिव्य दृष्टि प्रदान की और अनंत ब्रह्मा के दर्शन कराए हैं | अर्थात भगवान की अनंत सत्ता के विराट रूप से परिचित कराया है|      

दीपक दिया तेल भरि, बाटी दई अघट |

पूरा किया बिसाहुना, बहुरि न आवों हट||

Hindi Meaning:- संत कबीर कहते हैं कि गुरु ने शिष्य के शरीर रूपी दीपक को ईश्वरीय प्रेम रूपी तेल से भर दिया और उसमें ज्ञानरूपी अक्षय बत्ती डाल दी| उसकी ज्योति से जीव की सांसारिक वासना समाप्त हो गई|

अर्थात सांसारिक भावनाओं का क्रय और विक्रय समाप्त हो गया | जिसके परिणाम स्वरूप जीव को आवागमन के चक्र से मुक्ति मिल गई | अब उसे संसार रूपी बाजार में फिर नहीं आना पड़ेगा|

Kabir Ke Dohe in Hindi

Kabir ke Dohe

बूड़े थे परि ऊबरे, गुर की लहरि चमकि |

भेरा देख्या जरजरा, उतरि पड़े फरंकि ||

Hindi Meaning:- गुरु कृपा का वर्णन करते हुए कबीरदास कहते हैं कि हम तो भवसागर में डूब ही गए थे, इतने में ही गुरु की ज्ञान लहर चमक उठी| गुरु की कृपा से हमने देख लिया की हमारी नाव अत्यंत जर्जर है|

अतः हम उससे उछलकर कूद पड़े और अलग हो गए इस प्रकार गुरु द्वारा प्रदत्त ज्ञान के कारण हमारा सांसारिक मोह समाप्त हो गया और हम भवसागर से पार हो गए|

kabir ke vachan

चिंता तौ हरी नाव की , और न चिंता दास ||

जे कछु चितवै राम बिन, सोइ काल की पास ||

Hindi Meaning:- कबीरदास जी कहते हैं कि हरि के सच्चे सेवक ईश्वर का ही चिंतन करते हैं अन्य किसी वस्तु की चिंता नहीं करते वे इस बात को भली प्रकार जानते हैं कि ईश्वर का स्मरण करने के अतिरिक्त अन्य सभी चिंतन मृत्यु के समान बंधन कारी है

तूँ तूँ करता तूँ भया, मुझ मै रही न हूँ |

बारी फेरी बलि गई , जित देखों तित तूँ ||

Hindi Meaning:- इन पंक्तियों के माध्यम से कबीर दास जी ने बताया है कि परमात्मा में लीन होने का परिणाम यह होता है कि स्वयं  वह व्यक्ति भी परमात्मा का ही रूप प्राप्त कर लेता है| इसलिए कबीरदास जी कहते हैं-

हे प्रभु..  तू तू  करते-करते अब मैं तेरे ही रूप वाला हूं गया हूं अर्थात प्रभु का नाम रटते रटते अब मैं भी प्रभु के जैसा ही हो गया हूं| परमात्मा में लीन हो जाने के कारण मेरा सारा अहंकार समाप्त हो गया है|

परिणाम स्वरूप मेरे लिए जन्म मरण का चक्र भी समाप्त हो चुका है अब मैं जिधर देखता हूं उधर तू ही तू दिखाई देता है|

कहने का तात्पर्य यह है कि प्रभु का स्मरण करते करते भक्तों ने परमात्मा का ही रूप प्राप्त कर लिया है अब उसे संसार में चारों ओर परमात्मा के ही दर्शन होते हैं|

Kabir Das Ke Dohe in Hindi with Meaning

sant kabir das ke dohe

कबिरा सूता क्या करे, काहे न देखै जागि |

जाके संग तै बिछुड़या , ताहि के संग लागि ||

Hindi Meaning:- इस दोहे में कबीर दास जी ने सांसारिक मोह त्यागने की चेतावनी दी है वह कहते हैं कि हे  जीव, तू मोह मुंद्रा में पड़ा हुआ क्या कर रहा है, अर्थात तू मोह  निद्रा में क्यों पड़ा हुआ है|

तू जागकर  वास्तविक तथ्य को क्यों नहीं देखता| तू ज्ञान का प्रकाश प्राप्त करके अपने दुखों का भगवान से निवेदन क्यों नहीं करता है|

अरे जीवात्मा! तू अज्ञान के कारण जिस ब्रह्मा से अलग हो गया है अब उसी को प्राप्त कर अर्थात जीवात्मा का परमात्मा से मिलन करा दें |

kabir das ke dohe

केसो कहि कहि कूकिये , न सोइये असरार |

राति दिवस कै कूकणे, कबहुँ लगे पुकार ||

Hindi Meaning:- इस दोहे में कबीर (Kabir) ने भगवान का स्मरण करने पर बल दिया है और उनका विश्वास है कि लगातार भगवान का नाम स्मरण करने से कभी ना कभी ईश्वर को प्राप्त करने में सफलता अवश्य मिलती है|

कबीरदास जी जीवों को संबोधित करते हुए कहते हैं- हे प्राणियों! हर समय ईश्वर का नाम लेकर उसे पुकारते रहो, तुम आलस्य मत करो| अर्थात  अज्ञान निद्रा का परित्याग करो| रात दिन लगातार पुकारने से कभी न कभी तुम्हें सफलता जरूर मिलेगी| अर्थात भगवान कभी ना कभी किसी दिन तुम्हारी पुकार अवश्य सुनेंगे|

लंबा मारग दूरि घर , बिकट पंथ बहु मार |

कहौ संतो क्यूँ पाइये , दुर्लभ हरी दीदार ||

Hindi Meaning:- इस दोहे (Dohe) में कबीर दास जी ने भगवान की प्राप्ति के मार्ग में आने वाली कठिनाइयों का वर्णन करते हुए कहा है कि भगवान की प्राप्ति का मार्ग बहुत लंबा है|

क्योंकि जहां पहुंचना है वह घर बहुत दूर है| प्रभु प्राप्ति का मार्ग न केवल लंबा है बल्कि कठिन भी है|

इस मार्ग में बहुत से लुटेरे( सांसारिक मोह) भी मिलते हैं | ऐसी स्थिति में है संतो, बताइए कि भगवान के दुर्लभ दर्शन कैसे प्राप्त हो?

यहु तन जारों मसि करों , लिखों राम का नाउ |

लेखणी करूँ करांक की , लिखि-लिखि राम पठाउ ||

Hindi Meaning:- परमात्मा के विरह में व्याकुल आत्मा कहती है कि मैं अपने इस शरीर को जलाकर उसकी स्याही बनाऊंगी|

इसके पश्चात अपनी हड्डियों की लेखनी बनाकर उस स्याही से  राम का नाम लिखकर प्रियतम राम के पास बार-बार भेजती रहूंगी, जिससे वह मुझ विरहणी की विरह दशा औरपीड़ा को समझ सके |

Kabir ke Dohe in Hindi with Meaning

कै बिरहनि कूँ मींच दे , कै आपा दिखलाइ |

आठ पहर का दाझणा, मोपै सह्या न जाइ ||

Hindi Meaning:- कबीर कहते हैं यह परमात्मा रूपी प्रियतम ! या तो इस आत्मा रूपी विरहणी को  मृत्यु प्रदान करो अथवा अपना स्वरूप प्रदर्शित करो | इसे भी अपने जैसा बनाओ आठों पहर अर्थात रात दिन बिरहा में जलना अब मुझ आत्मा रूपी विरहणी से सहा नहीं जाता है|

कबिरा रेख स्यंदूर  की , काजल दिया न जाइ |

नैनू रमइया रमि रह्या , दूजा कहाँ समाइ ||

Hindi Meaning:- कबीरदास (Kabir Das) जी कहते हैं कि मैंने सौभाग्यवती स्त्रियों की तरह अपनी मांग में सिंदूर की रेखा लगा ली है | यह मेरे प्रेम और मेरे सौभाग्य की सूचक है| अब लाल रंग स्वीकार कर लेने के बाद काजल को अपनाना मेरे लिए संभव नहीं है|

कबीर अपनी बात को स्पष्ट करते हुए कहते हैं कि हर स्थल पर रहने वाले परम प्रिय राम मेरे नेत्रों में रम गए हैं| इसलिए अब इन नेत्रों में किसी अन्य वस्तु के लिए स्थान ही नहीं है|

अर्थात राम को अपनाने के बाद सांसारिक वासनाओं की काजल को लगाना मेरे लिए किसी भी प्रकार संभव नहीं है |

सायर नाही सीप बिन. स्वाति बूँद भी नाही |

कबिरा मोती नीपजै , सुन्नी सिषर गढ़ माहि ||

Hindi Meaning:- इस साखी में कबीर ने मोक्ष रुपी  मोती का वर्णन करते हुए कहा है कि शरीर रूपी किले में सुषुम्ना नाड़ी के ऊपर उपस्थित ब्रह्मरंध्र में न समुन्द्र है, न सीप और न ही स्वाति नक्षत्र की बूँद है |

फिर भी वहां मोक्ष रूपी मोती उत्पन्न हो रहा है अर्थात एक अद्भुत ज्योति का दर्शन हो रहा है|

सामान्य रूप से यह विख्यात है कि जब समुंद्र की सीप में स्वाति नक्षत्र की बूंद पड़ती है तो वह मोती बन जाती है परंतु ब्रह्मरंध्र एक ऐसा अद्वितीय स्थान है जहां पर समुंद्र, स्वाति नक्षत्र की बूंद और सीप का अभाव होने पर भी मोक्ष रूपी मोती उत्पन्न हो रहा है|

पाणी ही तै हिम भया, हिम ह्वै गया बिलाइ |

जो कुछ था सोइ भया , अब कुछ कहा न जाइ ||

Hindi Meaning:- कबीरदास जी कहते हैं कि पानी जमकर बर्फ बन गया फिर वही बर्फ पिघल कर दोबारा पानी बन गया और उसका बर्फ रूप विलीन हो गया| इस प्रकार पानी का जो रूप पहले था अब पुनः  वही हो गया है|

उसके विषय में कुछ नहीं कहा जा सकता| इसी प्रकार जगत की उत्पत्ति, स्थिति और प्रलय में नाम मात्र का ही अंतर है|

वस्तुतः  तीनों का मूल रूप  एक ही है | मोक्ष की भी यही स्थिति है आत्मा परमात्मा की भी यही एकरूपता है कहने का भाव यह है कि आत्मा परमात्मा का ही अंश है| इसलिए जीव की मृत्यु के पश्चात आत्मा परमात्मा में ही विलीन हो जाती है|

Sant Kabir Ke Dohe

पंखि उड़ानी गगन कू, प्यंड रह्या परदेश |

पाणी पिया चाणक्य बिन , भूली गया यहु देस ||

Hindi Meaning:- कबीर कहते हैं कि जीव रूपी पक्षी योग साधना करके कुंडलिनी के सहारे सहस्राररूपी  आकाश में पहुंच गया और उसका शरीर संसार में ही रह गया|

सहस्रार मैं पहुंचकर जीवात्मा रुपी  पक्षी ने चोंच के बिना ही अमृत सरोवर का जल पिया है| जल पीकर उसे अलौकिक आनंद की प्राप्ति हुई तथा फिर वह इस देश को पूर्णता भूल गया|

कहने का भाव यह है कि आलोकित आनंद की प्राप्ति हो जाने पर जीवात्मा सांसारिक मोह और माया के बंधनों में नहीं बंधती  | वह तो पूर्ण  रूप सेब्रह्मानंद में ही लीन हो जाती है|

Kabir ke Dohe in Hindi

पिंजर प्रेम प्रकासिया , अंतरी भया उजास |

मुखी कस्तूरी महमहीं , बाणी फूटी बास ||

Hindi Meaning:- कबीर दास जी कहते हैं कि ईश्वर का साक्षात्कार होने पर ह्रदय में प्रेम का प्रकाश हो गया| और भीतर ही भीतर यह सारा प्रकाश छा गया है| मुख से राम नाम की कस्तूरी जैसी सुगंध आने लगी वाणी से प्रभु प्रेम की सुगंध फूट पड़ी|

नैना अंतरि आव तूँ , ज्यूँ हो नैन झाँपेउ |

ना हो देखौं और कू , ना तुझ देखन देउँ ||

Hindi Meaning;- कबीरदास जी कहते हैं हे परमात्मा जैसे ही मैं अपने नेत्र बंद करूं, तू मेरे नेत्रों  के अंदर शीघ्रता से आकर बैठ जा|

तुझे अपने नेत्रों में बंद करके मैं न तो  किसी अन्य को देखूँ और न ही तुझे किसी अन्य को देखने दू| अभिप्राय यह है कि दोनों एक दुसरे के प्रति अनन्य भाव रखे| प्रेम का चरमोत्कर्ष यही है |

कबिरा हरी रस यों पिया, बाकी रही न थाकि |

पाका कलस कुम्हार का , बहुरि न चढ़इ चाकि ||

Hindi Meaning:- कबीर कहते हैं कि मैंने ईश्वर की भक्ति का रस इतना छककर पिया है कि  मेरे मन की सारी तृष्णा  समाप्त हो गई है| जिस प्रकार कुम्हार का घड़ा पक जाता है तो उसे फिर चाक पर चढाने कि आवश्यकता नहीं होती |

ठीक उसी प्रकार मेरे मन में अब कोई सांसारिक लालसा नहीं है और इस स्थिति में आकर मैं आवागमन के चक्र से मुक्त हो गया हूँ |

हेरत हेरत हे सखी , रह्या कबीर हिराइ |

बूँद समाणी समद मै , सो कत हेरि जाइ ||

Hindi Meaning:- हे जीव आत्मा रूपी सखियों, परमात्मा को खोजते खोजते मैं स्वयं ही खो गया| अर्थात परमात्मा का ध्यान करते करते मेरा पृथक अस्तित्व ही समाप्त हो गया|

और वह परमात्मा में लीन हो गया| उदाहरण के द्वारा स्पष्ट करते हुए कबीर कहते हैं कि जो बूंद समुद्र में समा जाती है, उसे किस प्रकार खोजा जा सकता है|

कहने का तात्पर्य यह है कि जिस प्रकार समुंद्र में मिलकर बूंद अपना अस्तित्व समाप्त कर देती है| उसी प्रकार जीवात्मा जब परमात्मा में लीन हो जाती है तो उसकी पृथक सत्ता समाप्त हो जाती है | 

कबिरा यहु घर प्रेम का , खाला का घर नाही |

सीस उतारे हाथि करि , सो पैठे घर माहीं ||

Hindi Meaning:- कबीरदास जी प्रेम के मार्ग को बहुत कठिन बताते हुए कहते हैं कि यह तो प्रेम का है मौसी का नहीं , जहां हर कोई सरलता पूर्वक प्रवेश पा सकते हैं|

इसमें जाने के लिए व्यक्ति को सिर काट कर हथेली पर रखना पड़ता है|तब जाकर उसमें प्रवेश का अधिकार मिल पाता है|

कहने का तात्पर्य यह है कि  जब साधक अपने अहं भाव को पूरी तरह मिटा देता है तभी वह ईश्वर के प्रेम को सकता है |

पढ़िए प्रेरणादायक कविताये और Hindi Moral Stories

आपको Kabir ke dohe कैसे लगे और क्या शिक्षा मिली, ये हमें कमेंट करके जरूर बताये |


Related posts

Leave a Comment